कैलाश पर बैठे भगवान शिव

 
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मार्कण्डेय पुराण में एक कथा आती है, कैलाश पर बैठे भगवान शिव ने एक बार माता पार्वती को परिहास में 'काली' कह दिया। स्त्रियां सामान्यत: अपने रंग या सौन्दर्य पर उंगली उठता देख कर सहन नहीं कर पातीं। माता पार्वती को भी यह परिहास चुभ गया। वे शिव से रुष्ट हो कर यह कहते हुए चली गईं कि अब जबतक मेरा रंग गौर नहीं हो जाता मैं वापस नहीं आऊंगी।
रुष्ट माता पार्वती एक निर्जन वन में चली गईं। वहाँ एक ऊंची पर्वत चोटी थी, जिसपर किसी भी दिशा से चढ़ पाना सम्भव नहीं था। माता को वह शांत स्थान पसन्द आया, वे आकाश मार्ग से उस पर्वत चोटी पर पहुँच कर परमपिता ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तप करने लगीं। वहीं वन में घूमते एक सिंह की दृृष्टि जब चोटी पर तप कर रही पार्वती पर पड़ी तो वह उन्हें मार कर खा जाने को व्यग्र हो गया। किन्तु उस पर्वत चोटी पर पहुँच पाना कहीं से भी सम्भव नहीं था, सो वह वहीं नीचे खड़ा हो कर प्रतीक्षा करने लगा कि जब यह स्त्री गिरेगी तो मैं इसे मार कर खा जाऊंगा।
इधर माता को तपस्या करते करते वर्षों बीत गए। नीचे खड़ा सिंह भी यूँ ही चुपचाप खड़ा रहा। उनकी लम्बी तपस्या से प्रसन्न हो कर जब ब्रह्मदेव प्रसन्न हुए तो उन्होंने दर्शन दे कर उनसे वर मांगने को कहा। तब माता पार्वती ने कहा, मेरे बराबर ही तपस्या इस सिंह ने भी की है, सो मुझसे पहले इस सिंह को वर मिलना चाहिए। सिंह लोभ में ही सही, पर वर्षों तक माता के साथ रहा था, सो प्रसन्न ब्रह्मदेव ने उस सिंह को माता का वाहन होने और उनके समस्त गणों का नायक होने का वरदान दिया।
सज्जन व्यक्तियों के सान्निध्य में रहना, या किसी के अच्छे कार्यों से अनचाहे में जुड़ जाना भी मनुष्य को पुण्य का भागी बना देता है और उसके अनेक दोष छिप जाते हैं। इसीलिए जीवन में सदैव सज्जनों की संगत तलाशनी चाहिए। सिंह को इसी संगत का लाभ मिला था।
सिंह को वर देने के बाद ब्रह्मदेव ने माता पार्वती की इच्छानुसार उन्हें गौर वर्ण प्रदान किया। प्रसन्न पार्वती कैलाश लौट आईं और शिव के साथ सुखपूर्वक रहने लगीं। यही काली के गौरी होने की कथा है..।
-  सर्वेश तिवारी श्रीमुख

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