वास्तु: कैसी हो मकान की छत ?

 
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विभिन्न क्षेत्रों की ही तरह भवन निर्माण के क्षेत्र में भी कई प्रकार के प्रयोग सदा से होते आ रहे हैं, वे प्रयोग चाहे निर्माण टेक्नोलॉजी से संबंधित हों या फिर भवन के आकार-प्रकार से। इन प्रयोगों के अंदर वास्तुशास्त्र का भी सहयोग आज के समय में अनिवार्य रूप से लिया जाने लगा है।
भवन किसी भी आकार-प्रकार का क्यों न हो किंतु उस पर छत तो देनी ही होती है। आजकल अनेक प्रकार की छतों का निर्माण हो रहा है जिसमें समतल छत, गोल गुम्बद के आकार वाली छत, सपाट छत, ढलान वाली छत तथा पिरामिड के आकार वाली छतों की प्रमुखता दिखाई देती है।
छतों के आकार इस बात पर निर्भर करते हैं कि उस स्थान का प्राकृतिक वातावरण किस प्रकार का है। अगर कश्मीर जैसे हिमपात वाले स्थान पर समतल छत दी जाय तो उस भवन के ऊपर साल भर बर्फ जमा रहेगी, अत: वहां के वातावरण के अनुसार ढलान वाली या गुम्बदनुमा छत देना अनिवार्य हो जाता है।
वास्तुशास्त्र के अनुसार छत का आकार कैसा हो जिससे उस भवन पर भी किसी भी प्रकार की अमंगलता की छाया न पड़े, इस विषय में विचार करना आवश्यक होता है। किसी भी भवन की सुन्दरता छत से ही परिलक्षित होती है। अत: वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार रहते हुए छत की सुंदरता में भी किसी प्रकार की कमी न होने पाये, इसका ध्यान रखना भी आवश्यक होता है।
वास्तुविदों के अनुसार मकान की छत पिरामिड या मंदिर की छतों के समान नहीं होनी चाहिए। असमतल छत भी आकृति दोष के अन्तर्गत ही मानी जाती है। अतएव इस तरह के छतों वाले मकान दोषपूर्ण ही माने जाते हैं।
भवन की छत के बीच किसी भी प्रकार का गड्ढ़ा दोषपूर्ण माना जाता है अत: छत के बीच का हिस्सा चारों ओर की अपेक्षा थोड़ा उठा हुआ अवश्य होना चाहिएं।
कुछ भवन ऐसे भी होते हैं जिनके छतों के बीम दिखाई देते हैं। इस प्रकार के दिखाई देने वाले बीमों से अनेक प्रकार के हानिकारक प्रभाव होते हैं। वास्तुशास्त्र के अनुसार इन बीमों के नीचे बैठने रहने, सोने अथवा अन्य कोई कार्य संपादित करने से व्यक्ति विशेष के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। अनेक बार ऐसे बीम को छिपाने के लिए फाल्स सीलिंग करनी पड़ती है।
कुछ लोग भवन के कमरों की भीतरी छतों पर अपने मन के अनुसार ही गहरा नीला, गुलाबी, सिंदूरी लाल, गहरा लाल, नीला, काला रंग करवा लेते हैं। इन रंगों का दुष्प्रभाव घर में रहने वालों पर पड़ता है। घर की छत के अंदरूनी भाग पर सफेद, आसमानी, हल्का नीला रंग ही करवाना श्रेयस्कर होता है।
छत की बीम उत्तर-दक्षिण दिशा में देने से यह भवन में रहने वालों पर तनाव डालता है। कुछ लोग मकान के अंदर रबड़, नायलॉन, रैक्सिन, फोम, प्लास्टिक आदि की सामग्रियों का इस्तेमाल करते हैं। वास्तुशास्त्र के अनुसार छत वाले भाग पर इनसे बनी वस्तुओं को नहीं लगाना चाहिए क्योंकि इन वस्तुओं के प्रयोग से उस भवन में हमेशा बीमारियों का डेरा बना रहता है।
घर के अंदर लकडिय़ों का इस्तेमाल भी सोच-समझकर ही करना चाहिए। लोहा, एल्युमीनियम, टीन इत्यादि का प्रयोग छत वाले भाग पर करना वर्जित माना जाता है। इनके विभिन्न चुम्बकीय गुण मानव मस्तिष्क को विचलित करते हैं। इन धातुओं पर इलेक्ट्रोलोटिंग करके इनके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
कुछ भवनों में अधिकांशत: लोहे एवं एल्बेस्ट्स के चादरों की छतें होती हैं। भीतरी छतों का निर्माण तापरोधी वस्तुओं की शीट्स से ही करना चाहिए। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि भीतरी छतों को समतल कर दिया जाय। एस्बेस्ट्स के नीचे लकड़ी के पटरों का एक अन्य छत बनवा दिया जाना चाहिए।
कमरों की भीतरी छत का रंग डिजाइन फर्श की तुलना में हल्का होना चाहिए, साथ ही छत के केंद्रीय स्थान में प्रकाश की व्यवस्था करनी चाहिए। अगर कमरा बड़ा हो तो छत के केंद्र के अतिरिक्त पूर्व एवं पश्चिम दिशा से भी प्रकाश की व्यवस्था कर देनी चाहिए।
 झाड़-फानूस तथा पंखों को बराबर दूरियों पर छत में टांगना चाहिए। इस संतुलित व्यवस्था से मानसिक संतुलन बना रहता है।
मकान में लकडिय़ों का इस्तेमाल भी सोच-समझकर ही करना चाहिए। घर में बबूल, जामुन, अशोक, बरगद, पीपल आदि की लकडिय़ों का इस्तेमाल वर्जित है। इनमें से कुछ पदार्थ तामसिक गुणों वाले होते हैं। इन लकडिय़ों के प्रयोग से स्वास्थ्य कभी भी ठीक नहीं रहता।
छत के अंदरूनी भाग को सजाने के लिए कुछ लोग उसमें कील आदि ठोक दिया करते हैं। वास्तुशास्त्र के अनुसार छत में कील ठोकना दोषपूर्ण माना जाता है। आंतरिक सुंदरता को बढ़ाने के दृष्टिकोण से दुगुनी सीलिंग की ऊंचाई या फाल्स सीलिंग की व्यवस्था करना भी वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार वर्जित माना जाता है।
- आनंद कुमार अनंत

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