डोनाल्ड ट्रंप को सुप्रीम कोर्ट से तगड़ा झटका, ग्लोबल टैरिफ रद्द; भारत समेत कई देशों को मिलेगी बड़ी राहत
अमेरिकी सर्वोच्च अदालत ने 6-3 के बहुमत से टैरिफ को बताया अवैध; कहा- टैक्स लगाने का अधिकार सिर्फ संसद को, राष्ट्रपति को नहीं
वॉशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षी और विवादास्पद आर्थिक नीतियों को देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने बड़ा झटका दिया है। शुक्रवार को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा दुनिया के विभिन्न देशों से आने वाले सामान पर लगाए गए 'ग्लोबल टैरिफ' को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति द्वारा दूसरे देशों पर लगाया गया यह आयात शुल्क (टैरिफ) असंवैधानिक और अवैध है। इस फैसले के बाद भारत पर लगा 18 प्रतिशत 'रेसिप्रोकल टैरिफ' भी अब स्वतः ही अवैध घोषित हो गया है, जिससे भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
सुप्रीम कोर्ट के नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 6-3 के बहुमत से यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने अपनी व्यवस्था में कहा कि अमेरिकी संविधान के तहत टैक्स और टैरिफ लगाने की शक्ति विशेष रूप से 'कांग्रेस' (अमेरिकी संसद) के पास सुरक्षित है, राष्ट्रपति को इस तरह के वित्तीय फैसले लेने का एकाधिकार नहीं है। गौरतलब है कि ट्रंप प्रशासन ने इन शुल्कों को लागू करने के लिए 1977 के 'इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट' का सहारा लिया था और संसद को दरकिनार कर दिया था।
चीन, कनाडा और मेक्सिको पर लागू शुल्क भी हुए समाप्त
अदालत के इस फैसले का सबसे बड़ा असर चीन, कनाडा और मेक्सिको जैसे देशों के साथ चल रहे व्यापारिक संबंधों पर पड़ेगा। अप्रैल 2025 में ट्रंप ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए दुनिया के कई देशों से आने वाले सामान पर भारी टैरिफ थोप दिए थे। राष्ट्रपति का तर्क था कि इससे अमेरिकी फैक्ट्रियों को फायदा होगा और 'मेड इन अमेरिका' को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि राष्ट्रीय आपातकाल के लिए आरक्षित शक्तियों का प्रयोग मनमाने शुल्क लगाने के लिए करना कानून का अतिक्रमण है।
ट्रंप ने जताई थी 'देश बर्बाद' होने की आशंका
सुनवाई के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी भरे अंदाज में कहा था कि अगर सरकार यह केस हारती है, तो देश की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जाएगी। फैसले पर असहमति जताने वाले तीन न्यायाधीशों में से एक, जस्टिस ब्रेट केवनॉग ने भी लिखा कि इस आदेश से राष्ट्रपति के अधिकारों पर रोक लगेगी और भविष्य में व्यापारिक अव्यवस्था उत्पन्न हो सकती है। हालांकि, बहुमत के फैसले ने साफ कर दिया है कि लोकतांत्रिक प्रणाली में संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन अनिवार्य है। इस फैसले के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि राष्ट्रपति संसद की मंजूरी के बिना वैश्विक स्तर पर अपनी मर्जी से व्यापारिक शुल्क नहीं थोप पाएंगे।
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