पश्चिम यूपी में कृषि कानून वापसी के बाद बड़ा जाट नेता बनने की होड, जयंत के अगले कदम पर है सबकी नज़र !

 
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मेरठ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तीनों कृषि कानूनों की वापसी के अचानक फैसले ने पश्चिम उप्र की सियासत को गर्मा दिया है। अभी तक साझा जंग लड रहे रालोद और भाकियू के रास्ते अलग होते नज़र आने लगे हैं। रालोद, भाकियू और भाजपा के जाट नेताओं में पश्चिम उप्र का जाट नेता बनने की होड तेज हो गई है। जयंत के अगले राजनीतिक कदम पर भी सबकी नज़र लगी हुई है। 

एक समय राष्ट्रीय लोकदल, पश्चिम उत्तर प्रदेश की बडी सियासी ताकत था। समय के साथ रालोद की सियासी ताकत खत्म हो गई और आज रालोद का कोई भी जनप्रतिनिधि विधानसभा या संसद में नहीं है। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद रालोद का परंपरागत जाट-मुस्लिम गठजोड टूट गया था और इसके बाद रालोद के खाते में सियासी सूखा आ गया था । खुद रालोद के मुखिया रहे चौधरी अजित सिंह और उनके बेटे जयंत सिंह भी दो-दो  लोकसभा चुनाव हार गए। अजित सिंह के निधन के बाद रालोद की कमान अब उनके बेटे जयंत चौधरी संभाल रहे हैं।

कृषि कानूनों के खिलाफ लडी है साझा लडाई

तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ रालोद और भाकियू ने साझा लडाई लडी। 26 जनवरी की दिल्ली हिंसा के बाद जब भाकियू नेता राकेश टिकैत के आंसुओं ने माहौल बदला तो उसे ताकत रालोद के कारण ही मिली। रालोद समर्थकों की भीड से गाजीपुर बॉर्डर पर आंदोलन को नई ताकत मिल गई। रालोद के अध्यक्ष जयंत चौधरी भी रात को ही सारे पुराने मतभेद भुलाकर गाज़ीपुर बॉर्डर पहुँच गए थे। पांच सितंबर को मुजफ्फरनगर की किसान महापंचायत में भी रालोद और भाकियू समर्थकों की भीड जुटी थी। रालोद नेता जयंत सिंह और भाकियू नेता नरेश टिकैत व राकेश टिकैत ने मंच साझा किया था। कृषि कानूनों के सहारे रालोद की मंशा अपने खोये जाट व मुस्लिम वोट बैंक को हासिल करना था तो भाकियू नेतृत्व की सियासी मंशा भी हिलोरे मार रही थी ।

टिकैत और अजित सिंह में  कभी नहीं बनी

खुद को पश्चिम उप्र का बडा जाट नेता साबित करने के लिए रालोद मुखिया रहे अजित सिंह और भाकियू संस्थापक महेंद्र सिंह टिकैत के बीच राजनीतिक अदावत शुरू से ही चलती रही। एक बार भारतीय किसान कामगार पार्टी बनाकर दोनों ने साझा सियासी प्रयोग जरूर किया था , लेकिन यह प्रयोग  असफल रहा था । इसके बाद दोनों के बीच कभी नहीं बन पाई। अब भाकियू की कमान दिवंगत महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे नरेश टिकैत व राकेश टिकैत के हाथ में है तो रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वर्गीय अजित सिंह के बेटे जयंत सिंह है। तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ भाकियू, रालोद समेत सारे विपक्ष ने साझा लडाई लडी है, लेकिन अब कृषि कानून वापसी के ऐलान के साथ ही रालोद व भाकियू के रास्ते अलग हो गए, लग रहे  हैं। टिकैत परिवार में नरेश टिकैत का झुकाव पिछले चुनाव में चौधरी अजित सिंह की तरफ था,वहीं  राकेश टिकैत बीजेपी के डॉक्टर संजीव बालियान के समर्थन में थे और आखिर में राकेश ने अपने परिवार का समर्थन संजीव को ही दिलवा दिया था और अजित सिंह लगभग  6526 वोटो से चुनाव हार गए थे जिसके लिए चौधरी परिवार ,टिकैत परिवार को मुख्य दोषी मानता है, लेकिन गाज़ीपुर बॉर्डर पर राकेश टिकैत के आंसुओं के बाद चौधरी अजित सिंह ने खुद फोन पर राकेश और नरेश से बात कर समर्थन दे दिया था और जयंत को भेज दिया था, जिसके बाद मामला ही बदल गया था और दोनों परिवार एक बार फिर नजदीक आते नज़र आ रहे थे। 

खुद को बडा जाट नेता साबित करने की होड

प्रधानमंत्री के कृषि कानूनों की वापसी के बाद पश्चिम उप्र का सियासी माहौल फिर कुछ बदल गया है। भाजपा नेता इसे डैमेज कंट्रोल के रूप में देख रहे है तो रालोद मुखिया जयंत सिंह खुद को इसका श्रेय देने में जुट गए हैं। इसका ऐलान उन्होंने शनिवार को मुजफ्फरनगर के बघरा में हुई जनसभा में भी किया। कृषि कानूनों की वापसी का श्रेय मंच से जयंत ने रालोद को दिया और एक बार भी भाकियू का नाम नहीं लिया। इसे लेकर भाकियू में नाराजगी दिख रही है।  इसी तरह से कृषि कानूनों की वापसी की अचानक घोषणा से खुद को ठगा सा महसूस कर रहे भाकियू नेता राकेश टिकैत भी अभी किसान आंदोलन खत्म नहीं करने की बात कह रहे हैं। ऐसा करके वे अपना सियासी आधार परखने की कोशिश में लगे हैं। वे आज 22 को लखनऊ में पंचायत करने भी जा रहे है। 

इसी तरह से मोदी की घोषणा के बाद केंद्रीय राज्य मंत्री व मुजफ्फरनगर के सांसद डॉ. संजीव बालियान भी बीजेपी के प्रति जाटों की नाराजगी कम करने में सक्रिय हो गए है और जाटों के बीच खुद को बडा जाट नेता साबित करने में लग गए हैं। पश्चिमी यूपी में बीजेपी में संजीव ही अकेले ऐसा चेहरा भी है जिनकी जाटों में अपनी कुछ निजी पैठ भी है और कुछ गांव में उनका विरोध भी हुआ, लेकिन फिर भी वे लगातार गांव में जा रहे है। भाजपा के पश्चिम क्षेत्र के पूर्व अध्यक्ष व प्रदेश के पंचायत राज मंत्री भूपेंद्र सिंह भी जाट नेता के तौर पर अपनी गिनती करवाने की जुगत में लगे हुए हैं। भाजपा के क्षेत्रीय अध्यक्ष मोहित बेनीवाल को भी शामली जनपद का जाट होने के कारण ही इस पद पर नियुक्त किया गया था, मोहित के लिए भी बीजेपी का नुकसान कम करने की चुनौती सामने है।  

मेघालय के राज्यपाल भी हो रहे मुखर

खुद को किसान नेता बताने वाले मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक भी इस समय केंद्र सरकार को खरी-खरी सुनाने में लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेंद्र कुमार का कहना है कि 2022 में अपना राज्यपाल का कार्यकाल पूरा होने के बाद सत्यपाल मलिक की मंशा सक्रिय राजनीति में आने की है। भले ही आज सत्यपाल मलिक भाजपा में शामिल होने के कारण ही राज्यपाल बनाए गए, लेकिन उनकी  पृष्ठभूमि कांग्रेस और गैर भाजपाई नेता की रही है। इससे पहले अलीगढ से लोकसभा सांसद और राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं। बागपत के मूल निवासी सत्यपाल मलिक ने भाजपा के टिकट पर बागपत लोकसभा से रालोद मुखिया रहे अजित सिंह के खिलाफ चुनाव लडा था । अब फिर से अपनी प्रासंगिकता जाट नेता के तौर पर साबित करने की कोशिश में है।

भविष्य में जाट किसे अपना नेता स्वीकार करते है, इसका पता तो चुनाव के बाद ही लग पायेगा लेकिन किसान आंदोलन से मिली संजीवनी के बाद फ़िलहाल जयंत को लेकर पश्चिम में जाटों में उत्साह है , रालोद का सपा से गठबंधन भी माना जा रहा है लेकिन सीट बंटवारे को लेकर अभी गठबंधन की घोषणा नहीं हो पाई है जिसके चलते राजनीतिक कयास भी चलने लगे है। प्रियंका से फ्लाइट में मुलाकात और बसपा -कांग्रेस के साथ मिलकर गठबंधन की चर्चा ने भी राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है ,  राजनाथ सिंह के जरिये जयंत पर बीजेपी द्वारा भी डोरे डालने की चर्चा फैलती रही है। फ़िलहाल 2013 के दंगे से पैदा हुई जाट-मुस्लिम खाई किसान आंदोलन के चलते इस बार भरी हुई लग रही है और पश्चिम में जयंत एक मजबूत ताकत के रूप में उभरे हुए है और जयंत के अगले कदम पर ही सबकी नज़र लगी हुई है। 

 

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