यूं ही 'पार्टी विद डिफरेंस' नहीं है भाजपा

 
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नई दिल्ली।  भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) यूं ही नहीं खुद को 'पार्टी विद डिफरेंस' होने का दावा करती है। पिछले कुछ माह में जिस तरह उसने अपने शासन वाले तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बदला है, उससे साबित होता है कि भाजपा का सांगठनिक अनुशासन अन्य दलों से ज्यादा मजबूत है।

यह कहना गलत न होगा कि मजबूत नेतृत्व इसकी एक प्रमुख वजह है, जो गुजरात और उससे पहले उत्तराखंड एवं कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने के बावजूद किसी तरह के असंतोष का स्वर न पनप सका।

वहीं,भाजपा से इतर राष्ट्रीय दल के दर्जे वाली कांग्रेस को प्रदेश अध्यक्ष बदलने में नाकों चने चबाने पड़े। पंजाब इसकी नजीर है, जहां राज्य संगठन की कमान नवजोत सिंह सिद्धू के हाथों जाने में महीनों दिल्ली और चंडीगढ़ की दौड़ लगी रही।

बहरहाल, गुजरात में मुख्यमंत्री विजय रुपाणी के इस्तीफे के बाद राज्य सरकार के नए नेतृत्व की तलाश के लिए बैठकों का सिलसिला तेज हो गया है। जिस वक्त रुपाणी राज्यपाल को इस्तीफा सौंपने के बाद पत्रकार वार्ता कर रहे थे, उसी वक्त भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा दिल्ली से वीडियो कॉन्फेंसिंग के जरिए उत्तर प्रदेश में बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से मुखातिब थे।

एक दिलचस्प बात यह भी है कि अध्यक्ष जेपी नड्डा के कार्यकाल में भाजपा शासित तीन राज्यों में मुख्यमंत्री बदले गए। भाजपा के इतिहास में शायद वे पहले अध्यक्ष हैं, जिन्होंने महज छह महीने के भीतर तीन राज्यों में मुख्यमंत्री बदल हैट्रिक लगाई है।

उत्तराखंड में तो दो बार मुख्यमंत्री बदले गए। पहले त्रिवेन्द्र सिंह रावत की जगह तीरथ सिंह रावत को सूबे की कमान सौंपी गई, किंतु कुछ ही महीने बाद उनकी जगह पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री पद का ताज मिला। उधर, कर्नाटक में बीएस येद्दियुरप्पा की जगह बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त किया गया। उत्तराखंड में अगले वर्ष की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं। जबकि गुजरात में वर्ष 2022 के अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।

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