कभी मुख्तार की बोलती थी तूती, अब दरक रहा किला

 
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लखनऊ। कभी पूर्वांचल में माफिया मुख्तार की तूती बोलती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। इस बार लोगों का अनुमान है कि उसका किला अवश्य गिर जाएगा। इसका कारण है पहले से हर वर्ष कम हो रहा मुख्तार का वर्चस्व इस समय योगी सरकार द्वारा की गयी सख्त कार्रवाई लोगों के बीच बहुत कम हो गया है। लोगों के बीच मुख्तार का भय भी कम हुआ है और उनके समर्थकों में भी कमी आयी है।

कभी मऊ में मुख्तार अंसारी के खिलाफ खड़े होने की लोग हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। भय कहें या अंसारी बंधुओं का चुनावी गणित लोग चुनाव में उनके खिलाफ खड़ा होने वाला पहले से ही हार मानकर चलता था लेकिन भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के बाद मुख्तार के सितारे गर्दिश में जाते गये। वर्तमान में तो योगी सरकार द्वारा की गयी सख्त कार्रवाई से उनके लोग भी खुलकर उनके साथ आने को तैयार नहीं हैं। जमीन कब्जा करने का साम्राज्य भी जमींदोज हो चुका है। स्थिति यह है कि कभी कुख्यात के रूप में पहचान बनाने वाला मुख्तार को आज खुद के जान को खतरा महसुस होने लगा है।

यदि चुनावी आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो मुख्तार अंसारी ने मऊ से पहला चुनाव बसपा के टिकट पर लड़ा था। उस समय मुख्तार को 45.85 प्रतिशत वोट मिले थे। इसके बाद बसपा से उसका अनबन हो गया और अगले चुनाव में वह निर्दल चुनाव लड़कर ही 46.06 प्रतिशत वोट पाकर रिकार्ड बनाया। वहीं 2007 के चुनाव में भी बसपा ने प्रदेश में पूर्ण बहुमत हासिल किया था लेकिन मुख्तार ने मऊ से निर्दल लड़कर 46.78 प्रतिशत वोट हासिल किया था। इसके बाद अंसारी बंधुओं ने अपनी पार्टी कौमी एकता का गठन किया और 2012 में उसी से मुख्तार चुनाव लड़ा लेकिन रूतबा पहले की अपेक्षा बहुत कम हो गया। इस चुनाव में मुख्तार को 31.24 प्रतिशत ही मत मिले। 2016 में अंसारी बंधुओं ने बसपा में कौएद का विलय कर दिया। मुख्तार बसपा से चुनाव लड़ने के बावजूद 24.19 प्रतिशत ही मत पा सका।

मुख्तार की गिरती साख के बीच भाजपा, सपा और बसपा इस सीट पर नजर गड़ाए हुए हैं। उधर मुख्तार के बड़े भाई व उनके लड़के सपा में जा चुके हैं, लेकिन बहुत कम उम्मीद है कि समाजवादी पार्टी मुख्तार को अपनी पार्टी से लड़ाएगी। ऐसे में मुख्तार के लिए इस बार राह आसान नहीं होगा और विश्लेषकों का मानना है कि उनकी राजनीतिक दीवार ढह सकती है।

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