बाल कहानी: छोड़ दी शरारत

 
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हेमन्त और दीपक दो भाई थे जो अपने मम्मी पापा के साथ शहर में रहा करतेे थे। हेमन्त कक्षा नौ और दीपक कक्षा पांच का छात्र था। हेमन्त एक शान्त लड़का था जब कि दीपक बहुत ही चंचल और शरारती लड़का था।
गर्मियों की छुट्टी होते ही हेमन्त ने अपने मित्र मोहन के गांव जाने का प्रोग्राम बनाया और अपने छोटे भाई दीपक को साथ लेकर चल दिया मोहन के गांव। जाते समय मम्मी पापा ने दीपक को समझाते हुऐ कहा कि वह गांव जाकर शरारत न करे।
दोनों देर शाम तक मोहन के घर पहुंचे। थके होने के कारण दोनों खाना खाते ही सो गये। सुबह होने पर हेमन्त और दीपक, मोहन के साथ पूरे गांव की सैर करने निकल पड़े। गांव के शान्त वातावरण में चारों ओर खेत खलिहान, पेड़ पौधे, पशु पक्षी देखकर दोनों भाइयों का मन आनन्दित हो उठा। घूम फिर के सब वापस मोहन के घर आ गये।
घर पहुंचते ही मोहन की मां ने मोहन से गांव के बाजार जाकर कुछ सामान लाने को कहा। मोहन ने हेमन्त को तो अपने साथ ले लिया लेकिन दीपक को घर पर ही छोड़ दिया।
अकेला खेलते खेलते दीपक घर के पीछे जा पहुंचा जहां पर छप्पर लगा हुआ था। वहां रखी चारपाई पर बैठकर उसे एक नया अनुभव प्राप्त हुआ। इतने में उसे वहां एक माचिस रखी हुई दिखाई दी। वह सोचने लगा कि 'मम्मी घर पर तो मुझे माचिस छूने भी नहीं देती, क्यों न इस माचिस को जलाकर देखूं !' फिर क्या था उसने माचिस उठाई और तीलियां निकालकर जलाने लगा। उसकी इस शरारत से वहां रखी चारपाई में आग लग गई। इससे पहले कि वह आग को बुझाने की कोशिश करता, पूरा छप्पर धू धू कर जलने लगा। इतने में बाजार से वापस आये हेमन्त और मोहन, दीपक को ढूंढते हुए घर में पीछे पहुंचे तो दीपक को जोर जोर से 'बचाओ-बचाओ' चिल्लाते हुए सुना। आग की फैलती हुई लपटों को देखकर दोनों अचंभे में पड़ गये। जान की परवाह न करते हुए हेमन्त और मोहन आग में जा घुुुसे और दीपक को उठाकर बाहर की ओर भागे।
इस पूरी घटना में दीपक तो बेहोश हो गया, मोहन और हेमन्त के हाथ पैर भी काफी जल गये। इस बीच आस पास के लोग भी वहां पहुंच गये और जल्द ही आग पर काबू पा लिया। डाक्टर को बुलाया गया और तीनों बच्चों की मरहम पट्टी करायी गई।
जब दीपक को होश आया तो उसे अपनी लापरवाही पर बहुत अफसोस हुआ। उसने फिर कभी शरारत न करने का निश्चय किया और हेमन्त व मोहन से माफी मांगी। हेमन्त ने हंसते हुए कहा, 'इस बार तो हम मौके पर पहुंच गये लेकिन अगली बार की कोई गारन्टी नहीं है।'
चार पांच दिन के उपचार के बाद तीनों बच्चे ठीक हो गये। गांव में दो दिन और रूककर हेमन्त और दीपक वापस अपने घर शहर चल दिये।
इसके बाद दीपक एक समझदार बालक बन गया और उसने शरारत करना हमेशा के लिए छोड़ दिया।
- अर्पित जैन कण्डेलिया

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