अवयस्क बच्चों को महंगे वाहन या मोबाइल गिफ्ट देना आपका प्यार नहीं!

 
1

आपने वह कथा पढ़ी होगी जिसमें एक चोर को जब चोरी की सजा सुनाई जाती है तो वह जज साहब से कहता है कि यह अपराध तो उसने ही किया है पर इसके वास्तविक अपराधी उसके पिता हैं क्योंकि बचपन में जब वह ऐसे छोटे छोटे अपराध करता था तो पिता ने उसे वैसा करने से रोका नहीं और धीरे धीरे चोरी उसकी आदत बन गई।
दरअसल अवयस्क बच्चों को महंगे वाहन या मोबाइल गिफ्ट देना आपका प्यार नहीं है। समय से पहले इस तरह के गिफ्ट पाकर बच्चों में मेहनत से कमाये हुये धन के महत्व प्रति उपेक्षा का भाव तो पैदा होता ही है, साथ ही ऐसे तेज रफ्तार मोटरसाइकिल जैसे वाहनों से बच्चे बेवजह सड़क पर करतब दिखाकर न केवल स्वयं का बल्कि दूसरों का जीवन भी संकट में डालते हैं। महंगी मोटरसाइकिल और मोबाइल से बच्चों में मित्रें के बीच शोआफ करने की प्रवृत्ति बढ़ती है। यह प्रवृत्ति बच्चे के चरित्र निर्माण में बाधक बनती है।
हमें समझने की जरूरत है कि वैज्ञानिक संसाधन सुविधा के लिये हैं न कि लाड़ दर्शाने के लिये। कल्पना कीजिए कि आपको बिना आवश्यकता, बिना मेहनत अत्यधिक नवीनतम गैजेट्स मिल जायें तो आपकी क्या मनोदशा होगी ? यही हाल बच्चों का होता है जब उन्हें फिजूल ही ऐसे गिफ्ट माँ बाप से लाड़ में मिल जाते हैं।
जरूरत है कि अनिवार्य आवश्यकताओं से बच्चों को वंचित न रखें और व्यर्थ की सुविधाओं तथा जरूरतों के बीच एक संतुलन रखकर बच्चों का सही विकास करें।
 ऐसे महंगे गिफ्ट देने का सामर्थ्य यदि आपको भगवान ने दिया है तो उस पैसे को समुचित दिशा दें। बच्चे के स्वास्थ्य के लिये उसे जिम भेजा जा सकता है।
 उसकी शिक्षा पर बेहतर खर्च किया जा सकता है, उसे संस्कारित करने वाला साहित्य उपहार में दिया जा सकता है, उसे देशाटन पर भेजा जा सकता है, उससे अच्छे कार्यो के लिये दान दिलवाया जा सकता है, भविष्य के लिये बच्चे के नाम पर धन जमा किया जा सकता है पर इस तरह के उपहारों पर अपव्यय से बचना चाहिये।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव

From around the web