बच्चों को कुपोषण से बचाता है दूध

 
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इस देश के विभिन्न राज्यों में चाहे वह पढ़ा लिखा व्यक्ति हो या अनपढ़, उनके घर में बच्चा पैदा होता है तो ये लोग अपने बच्चे के मुंह में मां का दूध न देकर अपने पारंपरिक रीति-रिवाज़ के मुताबिक कई क्षेत्रों में जैसे राजस्थान के क्षेत्र में पानी में शहद मिला कर बड़े बुजुर्ग के हाथ से बच्चे के मुंह में पहली खुराक दी जाती है। इसी तरह बिहार में बच्चे को बकरी का दूध या गाय का दूध पिलाया जाता है। यदि   इसके बदले बच्चे को पैदा होने के एवं घंटे के भीतर मां का गाढ़ा व पीला दूध पिलाया जाए तो बच्चों में बढ़ते कुपोषण को दूर किया जा सकता है।
इस देश में बहुत से समुदाय ऐसे हैं जो लोग मां के पहले दूध को अशुद्ध मानकर फेंक देते हैं। देश में मात्र 25 प्रतिशत माताएं  भाग्यशाली  हैं जो अपने बच्चे को पैदा होने के एक घंटे के अन्दर स्तनपान कराती हैं। ऐसा करने से बच्चे में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है जिससे बच्चा कुपोषण का शिकार नहीं बन पाता। ऐसा करने से भारत में करीब प्रतिवर्ष  2.5 लाख नवजात शिशुओं की जान बच सकती है। शिशु मृत्यु दर में बढ़ोत्तरी को भी रोका जा सकता है। इस गंभीर समस्या से लिपटने के लिए नीति निर्माताओं को लीक से हटकर कार्य करना होगा कि इस देश में मात्र ऐसे 25 प्रतिशत बच्चे ही भाग्यशाली हैं कि इन लोगों को मात्र दूध मिल पाता है।
6 माह तक सिर्फ मां के दूध का ही सेवन कराने से बच्चे में रोग प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि होती है और इससे बच्चे स्वस्थ रहते हैं। साथ ही बच्चों में दस्त व निमोनिया जैसी बीमारियों का प्रकोप कम हो जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चे को 6 माह तक अन्न, दूसरा दूध और यहां तक कि पानी भी नहीं दिया जाए तो दस्त व निमोनिया से होने वाली मौतें आधी हो सकती हैं।
भविष्य में स्तनपान ही एक ऐसा हथियार है जिससे बच्चों में बढ़ते कुपोषण को दूर करना सम्भव है। स्तनपान से बच्चों के भीतर रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है और पोषण सुरक्षा मिलती है जो कवच का काम करता है।
हालांकि हमारे देश में वर्तमान में भी 75 फीसदी महिलाएं बच्चों को स्तनपान नहीं कराती। इसका मतलब साफ है कि ये महिलाएं परंपरावादी समाज में जकड़ी हैं और कोई ऐसी सरकारी व्यवस्था नहीं है कि इन महिलाओं को जागरूक किया जा सके। समय- समय पर दैनिक पत्रों व अन्य माध्यमों से इसकी जानकारी दी जाती है लेकिन जरूरतमंद लोगों तक इन साधनों की पहुंच नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि बिना जागरूक किए बच्चों को कुपोषण से बचाना अत्यन्त मुश्किल कार्य है। इसलिए नीति निर्माण कर्ताओं को चाहिए कि इस संबंध में गांवों तक पहुंच बनाकर भविष्य में खतरे से छुटकारा पाने की कोशिश करें क्योंकि आज के बच्चे कल के भविष्य हैं। यदि बच्चे ही सुरक्षित नहीं रहेंगे तो देश कहां तक सुरक्षित रह पाएगा।
- अविनाश कुमार

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