अर्थहीन हो गये हैं रिश्ते !

 
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रोज सुबह अखबार खोलते ही नजर मर्डर, रेप, विस्फोट, लूट-पाट आदि पर जाती है। इनके प्रति एक्सपोजर ने आज हमें बिलकुल संवेदनहीन बना दिया है। कुछ हद तक तो यह नेचरल ही था क्योंकि सभी को अपनी जिन्दगी जीनी है, अपनी फिक्र  करनी है। कोई कहां तक रोये इन बातों को लेकर।
लेकिन इन बातों को नजरअंदाज भी तो नहीं किया जा सकता। आज जब बुजुर्गों का दयनीय हश्र देखते हैं तो अपने इंसान होने पर शर्म आती है। सत्तर से लेकर अस्सी नब्बे तक की उम्र के लोग आज अकेले रहने पर मजबूर हैं। अकेले निस्सहाय होने पर वे गुंडे बदमाशों के लिए आसान शिकार बन जाते हैं। लूट-पाट के अलावा आज उन्हें कई बार अकारण ही मार दिया जाता है और मिस्ट्री है कि सुलझने में नहीं आती।
क्यों हो गए हैं रिश्ते इतने कमजोर? क्यों युवा पीढ़ी की आंख का पानी मर गया है? उन पर न अब समाज का अंकुश है न नैतिकता का। कानून भी बस आई वॉश ही है। बुजुर्गों के हित में कानून भी असहाय बन कर रह गया है। कितने बुजुर्ग संतान द्वारा उपेक्षा और प्रताडऩा के लिए कानून की शरण में जाते हैं? उनकी मजबूरी है क्योंकि इससे तो वे अपने ही बच्चों के और भी घोर दुश्मन बन जाएंगे।
आज इंसान जानवर से बदतर हो गया है। जानवर तो बेचारे अपनी प्रकृति के अनुसार जीते हैं लेकिन व्यक्ति की खुदगर्जी, चालाकी और अहसानफरामोशी की इंतिहा नहीं। अपने पालनहारों को वह कितने आराम से भुला देता है। जब तक अपना स्वार्थ था, वे उसके लिए सब कुछ थे। जहां स्वार्थ सिद्ध हो गया और अपनी करने की बारी आई, अपनी जिम्मेदारियों से वो एकदम से मुंह मोड़ लेता है। मां बाप पैसे वाले हैं, जमीन जायदाद के मालिक हैं तो भाई-भाई या भाई बहन प्रापर्टी के लिए उन्हें जीते जी ही मार डालते हैं या फिर आपस में लड़ मरते हैं। सुपारी देकर मर्डर करवा देते हैं। इससे बुरी हालत और क्या होगी।
क्या हम फिर से उस नरभक्षी व्यवस्था की ओर लौट रहे हैं जब इंसान अपनी ही जान का मांस नोच कर खा जाता था। आज कौन किसका विश्वास करे। बाप बेटी का रेप कर रहा है, मर्डर कर रहा है। लड़की के अविवाहित ही गर्भवती होने पर समाज के डर से स्वयं मां उसका नृशंसता से मर्डर कर रही हैं। पति पत्नी की जान लेता है तो कहीं पत्नी प्रेमी के साथ मिलकर पति को रास्ते से हटाने के लिए उसका काम तमाम कर देती है। पोता दादी को पॉकेट मनी के लिए परलोक पहुंचा देता है तो किशोर उम्र के बच्चे अपने ही दोस्त का पैसों के लिये पहले अपहरण फिर मर्डर कर देते हैं।
यह सब उस देश में हो रहा है जहां रिश्तों की पूजा होती थी। रिश्तों की पवित्रता को सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती थी। सुख-सुविधाओं के इतने भौतिक साधन न थे फिर भी रिश्तों की मिठास जीवन सुखमय और मधुर बनाये रखती थी। हर रिश्ते की अपनी मर्यादा थी जो बच्चे जन्म के साथ ही सीखने लगते थे।
रिश्ते सुरक्षा कवच हुआ करते थे। सभी एक दूसरे के काम आते थे। बुढ़ापा परिवार की सुरक्षा में आराम से कट जाता था। बुजुर्गों को पूरा सम्मान मिलता था। उनकी राय सुप्रीम थी। सास को पूरा मान सम्मान मिलता था। बुढ़ापे में उसे काम में नहीं खटना पड़ता था। एक अदद नौकरानी बनकर नहीं रहना पड़ता था।
घोर अपमान, जिल्लत, बेकदरी और प्रताडऩाओं के कारण ही आज बड़े बुजुर्ग अकेले रहने पर मजबूर हैं। रोज-रोज मरने के बदले वे बदमाशों के द्वारा एक ही बार मार दिये जाने का रिस्क उठाने को तैयार हैं।
साथ रहने पर एडजस्टमेंट की जरूरत दोनों ही तरफ से अपेक्षित है। बड़े बुजुर्गों को भी अपने सेट आइडियाज़ में समय को देखते हुए थोड़ा लचीलापन लाना होगा। संतान को भी उनकी मानसिकता, भावनाओं व अपेक्षाओं के प्रति उदारता से सोचना चाहिए कि बुढ़ापा उन पर भी आएगा और माता पिता ने उनके लिए क्या कुछ नहीं किया। यह कर्ज है उन पर जिसे इसी जन्म में उतारना है।
- उषा जैन शीरी'

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