गरीब मुल्कों को 'वैक्सीन' की उपलब्धता का सवाल

 

- प्रभुनाथ शुक्ल

कोविड-19 की दूसरी लहर ने एकबार फिर सरकार और लोगों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत और दुनिया के दूसरे मुल्कों में यह पुनः तेजी से पांव पसार रहा है। जिस तरह के हालात बन रहे हैं उससे तो आशंका है कि पांच राज्यों में चुनाव के बाद देश एकबार फिर 'लॉकडाउन' में वापस लौट सकता है। दोबारा शटर गिराने की नौबत आयी तो आर्थिक हालात इतने बदतर हो जाएंगे कि संभाले नहीं संभलेंगे। कोरोना संक्रमण की वजह से जहां आर्थिक हालात बिगड़ रहे हैं वहीं अमीर और गरीब देशों के बीच वैक्सीनेशन को लेकर असमानता भी देखने को मिल रही है। गरीब देशों को प्राथमिकता के आधार पर वैक्सीन उपलब्ध कराना एक चुनौती बन गया है।

अबतक वैक्सीन की जो उपलब्धता देखी गयी है वह अमीर देशों में है। गरीब मुल्क इस दौड़ में काफी पीछे हैं। अमीर देशों की यह नैतिक और मानवीय जिम्मेदारी है कि वह आर्थिक रूप से कमजोर देशों को भी कोविड-19 की वैक्सीन प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध कराएं, लेकिन ऐसा फिलहाल संभव नहीं दिखता है। क्योंकि जिनके पास पैसा है वह महंगी वैक्सीन भी खरीद सकते हैं, लेकिन जिन देशों के आर्थिक हालात कमजोर हैं उनके लिए यह टेढ़ी खीर होगी। वैक्सीन को लेकर जो तथ्यगत आंकड़े आए हैं वह अमीर और गरीब देशों की बीच असमानता बढ़ाते दिखते हैं। दुनिया के देशों को इसपर गंभीरता से विचार करना चाहिए। अपने देश के नागरिकों को सुरक्षित रखने के साथ गरीब मुल्कों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

अमीर और गरीब मुल्कों के बीच के फासले को आप आसानी से समझ सकते हैं। ब्रिटेन में 58 और अमेरिका में 38 फीसदी वयस्कों को वैक्सीन लग चुकी है। ब्रिटेन भारत से 45 लाख डोज ले चुका है, अभी वह 50 लाख और हासिल करना चाहता है। जबकि अर्जेंटीना, ब्राजील, म्यांमार और सउदी अरब और दक्षिण अफ्रीका एक करोड़ 20 डोज ले चुके हैं। संयुक्त अरब अमीरात और कनाडा क्रमश पांच और दो लाख डोज हासिल कर चुके हैं। जबकि कोवैक्स अपने सदस्य देशों को इस साल निर्धारित लक्ष्य का सिर्फ 27 फीसदी ही वैक्सीन उपलब्ध करा सकता है। अधिकांश देश भारत से वैक्सीन लेना चाहते हैं। क्योंकि फाइजर और दूसरी कंपनियों के मुकाबले यहां की वैक्सीन सस्ती और रखरखाव के मामले में अव्वल है। जिसकी वजह से भारत से वैक्सीन लेने की होड़ मची है। इस हालात में गरीब देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराने का कोवैक्स ही एक प्रमुख माध्यम है। 'कोवैक्स' ने भारत के सीरम इंस्टीट्यूट और दक्षिण कोरिया की एक कंपनी से करार किया है।

गरीब देशों को कोवैक्स दो अरब डोज की आपूर्ति सुनिश्चित की है। लेकिन अभीतक उसका 20 फीसद हिस्सा के भी आपूर्ति नहीं हो पायी है। जबकि कोवैक्स अभी सिर्फ तीन करोड़ 20 लाख डोज की आपूर्ति कर सका है। 86 फीसदी वैक्सीन भारत से आपूर्ति होनी है। लेकिन भारत में बढ़ते कोविड संक्रमण की वजह से सरकार ने वैक्सीन निर्यात पर अस्थायी रोक लगा रखी है। क्योंकि बढ़ते टीकाकरण की वजह से वैक्सीन की डिमांड अधिक बढ़ गयी है। दुनिया के 14 फीसदी अमीर मुल्कों ने अपने लिए 53 फीसदी वैक्सीन की आपूर्ति कर ली है। जबकि कोवैक्स गरीब देशों को साल के अंत तक सिर्फ 27 फीसदी वैक्सीन ही उपलब्ध करा पाएगा। दुनिया भर में अबतक एक अरब डोज का उत्पादन हो चुका है। जबकि 2021 तक गरीब देशों में रहने वाले हर दस व्यक्ति में नौ लोगों को वैक्सीन नहीं लग पाएगी। अमीर और गरीब मुल्कों के बीच का अंतर आप इसी से समझ सकते हैं।

गरीब देशों को जिस संगठन के माध्यम से वैक्सीन उपलब्ध करायी जानी है उसका नाम कोवैक्स है। इसमें कुल 192 देश शामिल हैं। समझौते के अनुसार हर देश को उसकी आबादी के अनुसार 20 फीसदी वैक्सीन उपलब्ध करायी जानी थी। लेकिन अभी इसकी आपूर्ति संतोषजनक नहीं है। कोवैक्स की 85 फीसदी से अधिक वैक्सीन की आपूर्ति भारत करेगा। भारत फरवरी में घाना जैसे मुल्क को छह लाख डोज की आपूर्ति कर चुका है। पड़ोसी और गरीब मुल्कों को प्राथमिकता के आधार पर वैक्सीन उपलब्ध कराना भारत की मंशा रही है, लेकिन देश में बढ़ते संक्रमण की वजह से इसमें बांधा पहुंच सकती है। क्योंकि भारत में वैक्सीन की मांग बढ़ गई है। वैक्सीनेशन की प्रक्रिया और तेज की गयी है। कोवैक्स के सामने जो तस्वीर उभर कर आयी है उससे तो कम से यही लगता है कि गरीब देशों को त्वरित गति से वैक्सीन उपलब्ध कराना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य होगा। भारत इस दिशा में पहले की साहसिक कदम उठा चुका है। उसने श्रीलंका, नेपाल, बंग्लादेश समेत दूसरे मुल्कों को प्राथमिकता के आधार कोविड वैक्सीन उपलब्ध कराई।

अमीर देशों के पास पैसा है जबकि आर्थिक रूप से कमजोर देशों के पास कोविड के साथ-साथ दूसरी और गंभीर समस्याएं हैं। इस हालात में अगर उन्हें समय पर वैक्सीन नहीं उपलब्ध कराई गयी तो स्थिति बिगड़ सकती है। क्योंकि वैश्विक स्तर पर कोरोना की दूसरी लहर चल रही है। भारत में समेत और दूसरे देशों में इसका प्रसार तेजी से हो रहा है। लोखों की संख्या में इस महामारी की वजह से लोग अपने प्राण गंवा चुके हैं। उस हालत में अमीर देशों के साथ-साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी दायित्व बनता है कि असमानता का यह जो अंतराल दिख रहा है उसे पाटा जाए और मानवीयता के आधार पर पीछड़े और गरीब देशों को कोविड़ की वैक्सीन उपलब्ध करायी जाय। यह सवाल मानवता का है। कोवैक्स के साथ दुनिया के अमीर देशों को चिंतन करना चाहिए। सिर्फ अपना हित साधना मानवीयता के खिलाफ है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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