क्यों बन जाते हैं बच्चे एग्रेसिव?

 
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इन दिनों पत्र- पत्रिकाओं एवं न्यूज चैनलों पर प्राय: इस तरह की खबरों से आप जरूर रू-ब-रू होती होंगी कि अमुक बच्चे या किशोर ने किसी की हत्या कर दी या वह किसी अपराध को अंजाम देते पकड़ा गया।
क्रोध और जिद्दी स्वभाव वाले बच्चे तो आपके आस-पास भी होंगे। नाबालिगों में आक्रामकता की ऐसी प्रवृत्ति इससे पहले कभी नहीं देखी गई थी। यही कारण है कि आज के समय में अभिभावकों, मनोवैज्ञानिकों तथा समाजशास्त्रियों के लिए यह मुद्दा चिंताजनक पहलू बनता जा रहा है। आखिर ऐसा होता क्यों है? इस पर चर्चा आवश्यक है।
नाबालिगों में बढ़ती आपराधिक या आक्रामक प्रवृत्ति के लिए कुछ हद तक हार्मोन भी उत्तरदायी होते हैैं। उनके अनुसार इन दिनों मीडिया एक्सपोजर के चलते बच्चों का शारीरिक विकास समय से पहले हो रहा है।
 इस कारण बच्चों में हार्मोनों की सक्रि यता अतीत के मुकाबले अब कहीं ज्यादा बढ़ चुकी है और यह सक्रियता कुछ बच्चों व किशोरों को आक्रामक बनाकर उन्हें अपराध करने की ओर दुष्प्रेरित कर सकती है।
हर शख्स के शरीर में मेल तथा फीमेल हार्मोन होते हैं। जब बच्चों में मेल हार्मोन अनुपात (निश्चित अनुपात) से अधिक सक्रिय हो जाते हैं, तो वे बेहद आक्रामक प्रवृत्ति के हो जाते हैं। इसी प्रकार जब बच्चियों में फीमेल हार्मोन की मात्रा निश्चित मात्रा से अधिक हो जाती है तो वे अत्यधिक सेक्सुअल  हो जाती हैं तथा अवैध सम्बन्ध स्थापित करने के लिए नागिन सी छटपटाती रहती है। ऐसा न होने पर वे आक्र ामक हो उठती हैं।
12-13 वर्ष की उम्र के दौरान बच्चों में अनेक परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप बच्चों की मानसिक प्रवृत्तियों पर भी असर पड़ता है और उनकी यह धारणा बन जाती है कि अब वे समझदार हो चुके हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब अभिभावक उनके साथ बच्चों सरीखा ही व्यवहार करते रहते हैं। नतीजतन, अक्सर वे बागी तेवर दिखाने लगते हैं।
 किशोरवय  के बच्चे किसी न किसी रोल मॉडल का अनुकरण करने लगे हैं। विडंबना यह है कि आजकल के बच्चे महात्मा गांधी, सरदार पटेल या अन्य किसी महापुरूष को अपना आदर्श या रोल मॉडल नहीं मानते। उनकी नजर में पैसे वाला शख्स ही महान होता है। यह स्थिति शोचनीय है।
अनेक बच्चे  अपनी जरूरतों की ओर मां-बाप का ध्यान आकर्षित करने के लिए गलत कदम उठाने से परहेज नहीं करते। ऐसे बच्चों के मन में यह धारणा घर कर जाती है कि गलत हरकतों से वे मां-बाप का ध्यान आकर्षित करने में सफल हो सकते हैं।
घर के दूषित माहौल से भी बच्चे गलत दिशा में भटक जाते हैं। मां-बाप के बीच आए दिन होने वाली कलह, घर में नशीले पदार्थों का सेवन, पराये पुरूष या परायी औरत के साथ अवांछनीय व्यवहार आदि ऐसे अनेक कारण हैं जिनका बच्चों के दिमाग पर खराब असर पड़ता है। ऐसे माहौल में बच्चों के मन में हीन ग्रंथियां पैदा हो जाती हैं। वे खुद को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं और उन्हें लगता है कि कोई उनसे प्यार नहीं करता। इस स्थिति में बच्चा अनेक कुसंगतियों में फंसकर असामाजिक कार्यों को अंजाम देने लगता है।
मनोवैज्ञानिकों तथा समाजशास्त्रियों के अनुसार बच्चों को सही दिशा देने की बुनियादी जिम्मेदारी पहले अभिभावकों की और फिर शिक्षकों की होती है। वही बच्चे गलत दिशा में भटक जाते हैं जिनके घर में प्रेमपूर्ण वातावरण नहीं होता और ऐसा वातावरण तैयार करने की जिम्मेदारी अभिभावकों की ही है।
उनके अनुसार मां-बाप को बच्चों के लिए वक्त निकालना चाहिए। बच्चों की मांगों को गौर से सुनें तथा उनकी वाजिब मांगों को ही पूरा करें। शिक्षकों को बच्चों के प्रति मृदुल व्यवहार अपनाकर नैतिक शिक्षा पर विशेष जोर देना चाहिए।
- पूनम दिनकर

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