मुज़फ्फरनगर: अपहरण के मामले में गैंगस्टर कोर्ट ने सुनाई 5 साल की सजा, जुर्माना भी किया

 
कोर्ट

मुजफ्फरनगर। पाँच लाख की फिरौती के लिए अधिवक्ता के भाई का अपहरण करने के आरोपी को गैंगस्टर कोर्ट से पाँच साल का कठोर कारावास और दस हजार रूपये जुर्माना की सजा सुनाई गई है।

अभियोजन के अनुसार, यह प्रकरण थाना झिंझाना का है, जिसमें 4 मई 1995 को घिसल पट्टी बड़गांव सहारनपुर निवासी अधिवक्ता नरेश कुमार पुत्र बारू अपने गाँव में अपने छोटे भाई पवन व गाँव के अन्य लोग तोता राम व राका प्रेम के साथ खेत पर रात में थ्रेसर से गेहूँ निकाल रहे थे कि अचानक चार बदमाश अपने हाथों में तमंचे लेकर आये और जान से मारने की धमकी देते हुए नरेश के छोटे भाई पवन का अपहरण कर ले गए और छुड़ाने की एवज में 5 लाख रूपये की फिरौती मांगी।

इस घटना की अधिवक्ता नरेश कुमार ने थाना झिंझाना में रिपोर्ट लिखाई, पुलिस ने 20 दिन बाद बदमाशों को खोज निकाला और मुठभेड़ में पवन को आजाद कराया, जिसमें पुलिस ने चार बदमाश रामकुमार पुत्र स्व सोमदत्त शर्मा निवासी भावसा तीतरो सहारनपुर, सुशील पुत्र धर्मपाल निवासी हथछोया झिंझाना, सत्यपाल उफऱ् पालू पुत्र फेरु निवासी हथछोया व जगदीश पुत्र शिवदत्त निवासी विराल धारा कांधला को गिरफ्तार कर जेल भेजा।

पूर्व थानाध्यक्ष झिंझाना सुरेश सिंह चौहान ने इन अभियुक्तों के विरुद्ध गेंगेस्टर एक्ट में चालान किया, अभियुक्त सुशील व जगदीश की विचारण के दौरान मौत हो चुकी, जबकि सत्यपाल को पहले ही सजा हो चुकी।

शुक्रवार को सुनवाई पूरी होने पर गैंगस्टर जज बाबूराम ने अभियुक्त रामकुमार को 5 साल  के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माना से दंडित किया। जुर्माना न देने पर एक माह का अतिरिक्त कारावास भोगना होगा, अभियुक्त रामकुमार को कस्टडी में लेकर जेल भेज दिया गया।

संदीप सिंह अभियोजन अधिकारी व विशेष लोक अभियोजक़ दिनेश सिंह पुंडीर, राजेश शर्मा ने पैरवी की।

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अभिषेक यादव के कड़े परिश्रम से दोषमुक्त होने की कगार पर खड़े मुकदमे को संजीवनी और अभियोजन को सफलता मिली। दरअसल इस वाद में वादी नरेश व अपहृत पवन और थानाध्यक्ष सुरेश चौहान की दस वर्ष पूर्व आधी गवाही हो चुकी थी, लेकिन बचाव पक्ष ने जिरह नहीं की, तो कोर्ट ने जिरह का अवसर समाप्त कर दिया, इस पर बचाव पक्ष उच्च न्यायालय से गवाहों से जिरह की अनुमति प्राप्त करने में सफल रहा, इतने वर्षो में अधिवक्ता नरेश अपने गाँव चले गए और थानाध्यक्ष रिटायर हो गए। काफ़ी खोजने पर भी इनका पता नहीं चल पा रहा था, ऐसे में जिरह के अभाव में इन महत्वपूर्ण वाहनों की पूर्व गवाही का महत्व भी खत्म हो गया था, कोर्ट द्वारा साक्ष्य समाप्त कर वाद निर्णय हेतु नियत कर दिया, निर्णय से एक दिन पूर्व अभियोजन द्वारा एसएसपी को इस समस्या से अवगत कराया कि निर्णय से पूर्व भी यदि गवाह उपस्थित हो जाए तों अंतिम प्रयास किया जा सकता है।

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अभिषेक यादव ने इसे गंभीरता से लिया और अगले दिन विगत सप्ताह ही निर्णय से पूर्व अपहृत पवन, अधिवक्ता नरेश व सुरेश चौहान को कोर्ट में प्रस्तुत कराया, जिस पर अभियोजन द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के दृष्टांत रखते हुए गवाहों की गवाही की याचना की कि निर्णय से पूर्व भी कोर्ट अभियोजन को साक्ष्य का अवसर दें सकती है, प्रभावी बहस के उपरांत अभियोजन कोर्ट को संतुष्ट करने में सफल रहा और कोर्ट से अनुमति मिली, जिस पर अभियुक्त को जिरह करनी पड़ी, गवाहों ने भी जिरह में अभियोजन कथानक का पूर्ण समर्थन किया और आज अभियोजन अभियुक्त को सजा कराने में सफल रहा। 

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