सावरकर पर राजनाथ के बयान पर उठा विवाद,गांधी तो तब देश में ही नही थे, जब सावरकर ने दया याचिका दाखिल की थी !

 
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नयी दिल्ली, - रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर ने महात्मा गांधी के कहने पर ब्रिटिश सरकार के समक्ष दया याचिका दाखिल करने संबंधी बयान से विवाद खड़ा हो गया है तथा कुछ इतिहासकारों, विशेषज्ञों एवं राजनीतिक दलों ने आरोप लगाया है कि श्री सिंह ने तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया।

रक्षा मंत्री ने वीर सावरकर पर जाने-माने पत्रकार उदय माहूरकर एवं प्रो. चिरायु पंडित की पुस्तक के मंगलवार को विमोचन के अवसर पर सावरकर को 20वीं सदी का प्रथम रणनीतिक विचारक करार दिया और कहा कि उन्हें कुछ खास राजनीतिक विचारधारा से जुड़े लोगों ने बदनाम किया। उन्होंने कहा, “सावरकर के बारे में झूठ फैलाया गया। यह बार-बार कहा गया कि उन्होंने ब्रिटिश सरकार के सामने दया याचिकाएं दाखिल की थीं लेकिन सच यह है कि उन्होंने स्वयं ये याचिकाएं दाखिल नहीं की थीं। किसी कैदी का अधिकार होता है कि वह दया याचिका दाखिल करे। महात्मा गांधी ने उनसे दया याचिका दाखिल करने को कहा था। उन्होंने दया याचिका दाखिल इसलिए की, क्योंकि महात्मा गांधी ने कहा था। गांधी जी ने अपील की थी कि सावरकर को रिहा किया जाना चाहिए, उन्होंने यह भी कहा था कि सावरकर को अन्य लोगों की तरह अहिंसक तरीके से स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेना चाहिए।”
सावरकर को गांधी जी द्वारा 1920 में लिखे गये पत्रों को कई राजनीतिक नेताओं ने साझा किया है जिन्होंने रक्षा मंत्री पर तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने का आरोप लगाया गया है। महात्मा गांधी की रचनाओं पर आधारित एक पुस्तक में सावरकर के भाई द्वारा गांधी जी को लिखा एक पत्र शामिल है जिसमें सावरकर की रिहाई नहीं करने के सरकार के निर्णय की दशा में आगे के कदमों के बारे में सुझाव मांगा गया था।
गांधी ने इसके जवाब में 25 जनवरी 1920 को लिखा था कि इस स्थिति में कोई सलाह देना बहुत कठिन है। उन्होंने कहा, “मेरा सुझाव है कि आप एक संक्षिप्त याचिका तैयार करें जिसमें केस के सभी तथ्यों को सामने रखा जाये कि आपके भाई द्वारा किया गया यह अपराध शुद्ध रूप से राजनीतिक प्रकृति का है, तभी कोई राहत मिल सकती है। यह सुझाव इसलिए है कि क्योंकि इससे इस केस में जनता का ध्यान आकृष्ट किया जा सकता है। वह हालांकि इस मामले को अपनी तरह से उठा रहे हैं। ”

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बुधवार को श्री राजनाथ सिंह पर गांधी जी के कथन काे तोड़ने-मरोड़ने का आरोप लगाते हुए ट्वीटर पर कहा, “राजनाथ सिंह जी मोदी सरकार में चंद संभ्रांत एवं गरिमापूर्ण बात कहने वालों में से एक हैं। लेकिन लगता है कि वह इतिहास के पुनर्लेखन की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की आदत से मुक्त नहीं हो पाये हैं। उन्होंने गांधी जी के 25 जनवरी 1920 के वास्तविक कथन को घुमा दिया है।”
कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा कि सावरकर को चार जुलाई 1911 को सेलुलर जेल में कैद किया गया था। छह माह के भीतर उन्होंने दया याचिका दाखिल की थी। उनकी दूसरी दया याचिका 14 नवंबर 1913 में दाखिल की गयी। गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से नौ जनवरी 1915 को लौटे थे।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) सीताराम येचुरी ने भी कहा कि बयानों को ऐसे तोड़-मरोड़ कर भी गुमराह नहीं किया जा सकता है। तथ्य यह है कि आरएसएस कभी भी स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा नहीं रहा। अक्सर ब्रिटिश शासन के साथ रहा।
भारतीय जनता पार्टी के नेता अमित मालवीय ने गांधी जी के सावरकर के बारे में एक उद्धरण को ट्वीट किया जिसमें कहा गया, “वह चालाक है, वह बहादुर है, वह देशभक्त है। बुराई सरकार के मौजूदा स्वरूप में छिपी है जिसे वह मुझसे बहुत पहले देख पाये। वह अंडमान में इसीलिये रहे क्योंकि वह भारत से बहुत प्रेम करते हैं। किसी सही सरकार में वह उच्च पद पर आसीन होंगे।”
आल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लमीन (एआईएमआईएम) के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कई ट्वीट करके कहा, “आपके कल के भाषण में आपने कहा कि सावरकर ने हिन्दू काे परिभाषित किया कि कोई भी जो भारत को मातृभूमि या पितृभूमि मानता हो। सावरकर हालांकि एक सीमित बुद्धि क्षमता वाले व्यक्ति थे जो दरअसल मानते थे कि हिन्दू वही है जिसके लिए भारत पितृभूमि एवं पवित्र भूमि है। उनके विचार में भारत मुसलमानों एवं ईसाइयों के लिए पवित्र भूमि नहीं है और इसलिये वे भारत के प्रति पूर्ण निष्ठावान नहीं हो सकते। रक्षा मंत्री के रूप में आपका क्या विचार है? क्या आप इस विचार को मानते हैं?”
बहुजन समाज पार्टी के नेता दानिश अली ने इसे तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करार दिया और कहा कि आरएसएस एक झूठ हजार बार बोलने से सच बनाने की कला में पारंगत है। इतिहासकार इरफान हबीब ने कहा कि गांधी जी के पत्र में उनकी उदारता का परिचय मिलता है। सावरकर ब्रिटिश राज से स्वतंत्रता नहीं चाहते थे। इसके विपरीत वह मानते थे कि भारत का भाग्य ब्रिटिश के साथ मिल कर चलने से अच्छा हो सकता है।

श्री राजनाथ सिंह ने पुस्तक वीर सावरकर : दि मैन हू कुड हैव प्रिवेन्टेड पार्टिशन’ का विमोचन करते हुए कहा था कि स्वतंत्रता संग्राम में सावरकर के योगदान को उचित स्थान नहीं मिला। पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत थे।

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