मेरठः सीएम योगी पर जल्दबाजी में फैसला लेकर रिस्क लेने के मूड में नहीं नेतृत्व  

 
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मेरठ। 2022 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दिल्ली से लेकर यूपी तक सियासी हलचल तेज है। मुख्यमंत्री योगी सरकार को लेकर दिल्ली से लखनऊ तक बैठकों का दौर चला और आखिर में भाजपा नेताओं ने 'प्रदेश में सब ठीक है' का बयान देकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की। लेकिन इन बयानों के बाद भी जिस तरह से सियासी गलियारों तापमान बढा हुआ है। वह कुछ अलग ही संदेश दे रहा है। माना जा रहा है कि अगर शीर्ष नेतृत्व ने समय रहते कोई विकल्प पेश नहीं किया तो भाजपा के नाराज विधायक आने वाले 2022 के चुनाव में पार्टी का गणित बिगाड़ सकते हैं। दूसरी ओर चुनाव से पहले पार्टी का शीर्ष नेतृत्व सरकार में बड़े बदलाव कर किसी प्रकार का रिस्क लेने से डर रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब प्रदेश में सब कुछ ठीक चल रहा है तो फिर दिल्ली से लखनऊ तक हुई मैराथन बैठकों की जरूरत क्यों पड़ी? कोरोना प्रबंधन से उपजे असंतोष, पंचायत चुनाव के नतीजों और विधायकों की नाराजगी ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की चिंताएं बढ़ा दी हैं। विपक्षी दलों, खासकर सपा और कांग्रेस ने संक्रमण में कुप्रबंधन का आरोप लगाते हुए योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। ऐसे में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इससे संभावित नुकसान को लेकर अलर्ट हो गया है और माहौल को दुरुस्त करने की तैयारी में जुटा है। इसी को लेकर दिल्ली से लेकर लखनऊ तक बैठकों का दौर चला। प्रदेश सरकार और संगठन में बड़े बदलाव और नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं गर्म हो गयीं। भाजपा के संगठन महामंत्री बीएल संतोष तीन दिन के लिए यूपी दौरे में रहे। उन्होंने मंत्रियों और विधायकों से फीडबैक लिया। कई नेताओं ने नाराजगी भी जताई। गत 24 मई की शाम दत्तात्रेय होसबले और सुनील बंसल भी लखनऊ पहुंच थे। जहां दोनों नेताओं ने अलग-अलग बैठक की थी। सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले की लखनऊ के दो दिन के प्रवास के दौरान न तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और न ही भाजपा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह समेत किसी प्रमुख राजनेता से मुलाकात हुई। इससे साफ हो गया कि प्रदेश में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और नेतृत्व में बड़ा बदलाव हो सकता है। दरअसल, सीएम योगी को लेकर शीर्ष नेतृत्व जल्दीबाजी में कोई फैसला लेने का रिस्क नहीं उठाना चाहता है। भाजपा सूत्रों के मुताबिक चुनाव से पहले नेतृत्व में बदलाव से अच्छा संदेश नहीं जाएगा। इससे पार्टी को नुकसान भी हो सकता है। इसलिए भाजपा इस कोशिश में भी है कि बाहर से किसी तरह का विवाद न दिखे। गत रविवार को जब भाजपा यूपी प्रभारी राधामोहन सिंह राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मिलने पहुंचे तो यूपी कैबिनेट में बदलाव की चर्चा तेज हो गई। लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि कैबिनेट विस्तार के फैसले का विशेषाधिकार सीएम के पास ही है। भले ही भाजपा नेतृत्व सब कुछ ठीक होने का दावा कर रहा हो लेकिन प्रदेश भाजपा में अंदरखाने घमासान चल रहा है। कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने के कारण सरकार की छवि को धक्का लगा है। वहीं अफसरशाही के हावी होने के कारण तमाम विधायक भी सरकार से नाराज चल रहे हैं।

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