रिश्ते (सम्बन्ध) एक ऐसा वृक्ष है जो भावनाओं के सामने झुक जाता है, स्नेह द्वारा अंकुरित होता है और शब्दों के माध्यम से टूट जाता है। तात्पर्य यह है कि रिश्ते बहुत नाजुक होते है, उन्हें नाज से पाला जाता है, जिनकी रक्षा भी सावधानी से की जाती है। कुछ रिश्ते ऐेसे होते हैं, जो परिवार में बनते हैं, परिवार से बनते हैं और कुछ रिश्ते अनजाने में बन जाते हैं। यात्रा, स्कूल, कालेज, ऑफिस और न जाने कब कहां बन जाते हैं। मित्रों के साथ नि:स्वार्थ भाव से बने रिश्ते अटूट होते हैं, जो कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं। एक रिश्ता ऐसा भी है जिन्हें मैंने कभी नहीं देखा, न कभी हम मिले, कोई कष्ट हो कोई विपत्ति हो, कोई भी दर्द हो उसमें अवश्य ही उसकी याद आती है। उसी पर भरोसा रहता है कि वही इस विपत्ति से बचायेगा और वह बचाता भी है। जानते हो वह अद्भुत रिश्ता कौन सा है? वह है मेरे प्रभु से रिश्ता सब टूट जाते हैं पर उससे रिश्ता जन्म जन्मान्तरों से इसी प्रकार चलता रहता आ रहा है। मेरा और मेरे प्रभु से रिश्ता बहुत गहरा और अटूट है। यह रिश्ता केवल भावनाओं और विश्वास से जुड़ा है। उसको स्मरण करते ‘सुमन’ महत्वपूर्ण। सुमन से तात्पर्य पवित्र, स्वच्छ, निर्मल मन। पवित्र मन से स्मरण किया जायेगा तो एक विशेष प्रकार अनुभूति जिज्ञासु को निहाल कर देगी, परन्तु ‘सुमन’ को भूलवश पुष्प के अर्थ में लिया है। पेड पौधों को खिलते पुष्पों से खाली कर पर्यावरण के शत्रु बन हम पाप के भाग बन रहे हैं।