Wednesday, April 17, 2024

विश्व महिला दिवस: 8 मार्च….जागती, लड़ती, अप्रतिम होती स्त्री

मुज़फ्फर नगर लोकसभा सीट से आप किसे सांसद चुनना चाहते हैं |

दुनिया भर में 8 मार्च स्त्री के ‘पुरुष की पहचान का दिन बन गया है क्योंकि इस दिन सारी दुनिया मिलकर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाती है । घर की चारदीवारी की छोटी सी दुनिया से निकलकर विस्तृत कर्म क्षेत्र में उतरने के बाद अब वह पिता, पुत्र, पति या किसी भी दूसरे पुरुष पर आश्रित नहीं रह गई है अपितु अपना धरातल स्वयं बना रही है और विश्व पटल पर अपना नाम अंकित कर रही है। अब स्त्री की पहचान किसी पुरुष से नहीं अपितु उसके स्वयं के जज्बे एवं उपलब्धियां से हो रही है।
देशभर में छाती स्त्रियां
यकीन न आए तो नजऱ डालिए फॉर्च्यून और फोर्ब्स की सूचियों पर । फॉर्च्यून इंडिया ने भारत की सबसे शक्तिशाली महिलाओं की जो सूची जारी की है 2023 की सूची में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लगातार पांचवें वर्ष प्रथम स्थान पर रहीं। उनके अतिरिक्त इस सूची में सोमा मंडल, किरण मजूमदार और रोशनी नादर देश की सबसे सबसे शक्तिशाली महिलाओं में शामिल की गईं हैं। बेशक यह सूची इसलिए याद आई क्योंकि आठ मार्च को मर्दों की के वर्चस्व वाली दुनिया में कोमलांगी कहे जाने वाली स्त्री की ताकत को पहचानने और, उसे सलाम करने का दिन है ।
मुगालते में न रहें
लेकिन स्त्रियों या दुनिया को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि 8 मार्च ने महिलाओं की हालत एकदम बदल दी है । कड़वा सच तो यह है कि जो महिलाएं इन सूचियां में स्थान पाती हैं या सार्वजनिक जीवन में अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफल होती हैं उनमें से अधिकांश किसी बड़े घर आने उद्योग या फिर राजनीतिक दल से जुड़ी हुई होती हैं अथवा उनकी पृष्ठभूमि बहुत रईस खानदान से आती है यदि एक सरसरी निगाह डालें तो स्त्री आज भी वही खड़ी नजर आती है जहां बहुत पहले थी । यदि देश में और दुनिया भर में आज भी स्त्री को दोयम माना जा रहा है, उसका वेतन और सम्मान पुरुष के समक्ष नहीं है तो फिर यह विश्व महिला दिवस भी बेमानी हो जाता है ।
एक पहलू यह भी
यदि भारत की महिलाओं पर एक नजर डालें तो आज भी उन्हें बहुत कम वेतन पर ईंट भट्टों, खदानों , खेतों और दूसरे स्थानों पर बहुत कम वेतन पर करीब-करीब बंधुआ मज़दूरों के रूप में देखा जा सकता है । इतना ही नहीं उनका शारीरिक एवं मानसिक उत्पीडऩ अभी भी बदस्तूर जारी है यदि आज भी बंगाल जैसे सुसंस्कृत कहे जाने वाले प्रदेश में वहां का जन प्रतिनिधि ही अपने क्षेत्र की महिलाओं के बलात्कार शोषण एवं उत्पीडऩ के लिए आरोपित हो तो फिर यह समझना मुश्किल नहीं है कि यथार्थ की धरातल पर एक आम औरत की स्थिति क्या और कैसी है।
महिलाओं की यह हालत केवल बंगाल में ही नहीं अपितु देश के कई प्रदेशों में देखी जा सकती है । मणिपुर में एक महिला को नग्न घुमाने का प्रकरण अभी भी मानस पटल से हटा नहीं है । राजस्थान में एक आंगनबाड़ी कार्यकत्री का यौन शोषण बहुत दिनों तक चर्चा में रहा , उत्तरांचल के एक मंत्री पर एक महिला को लंबे समय तक ब्लैकमेल करने एवं उसका मानसिक तथा शारीरिक शोषण करने का प्रकरण भी अखबारों में छाया रहा । केंद्र सरकार के एक स्वर्गीय मंत्री को तो लाई डिटेक्टर तक से गुजरने की हिदायत दी गई और डीएनए टेस्ट करने पर उसे स्त्री को उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करना पड़ा जिससे वह किसी भी संबंध से लंबे समय तक इनकार करते रहे ।
हटा नहीं स्याह पक्ष
इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ तेज तर्रार महिलाएं बहुत आगे आई हैं लेकिन भारी संख्या में महिलाएं किस तरह पुरुषों के द्वारा केवल एक मुखौटे के रूप में या माउथपीस के रूप में प्रयोग में लाई जाती हैं इससे इनकार नहीं किया जा सकता । साथ ही साथ कैसे उन्हें यूज करके अपने राजनीतिक स्वार्थ साधे जाते हैं यह भी अब किसी से छिपा नहीं है । मुंबई की मायानगरी में तो कोच कास्टिंग जैसे प्रकरण कितनी ही बार सामने आए किसी अभिनेता के घर में झाड़ू पोंछा करने वाली नौकरानी तक से जबरदस्ती करने के केस तक कोर्ट में चले हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि पुरुष आज भी अपनी हवस पूरी करने के लिए स्त्री का उपयोग करने में न हीं झिझकता है न ही शर्माता है और जब तक ऐसा होता रहेगा तब तक एक बार फिर से कहना होगा कि कोई भी महिला दिवस मानना केवल एक दिखावा मात्र ही कहा जाएगा।
बहुत बदली है स्त्री
परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है और घड़ी की सुई की तरह समय शिखर से रसातल और रसातल से शिखर तक लाने ले जाने का काम करता रहा है आगे भी करता रहेगा। मुगल काल में हरम की शोभा बनाए जाने वाली या फिर मंदिरों में ‘देवदासी अथवा ‘नगरवधू जैसे नाम देकर स्त्री की आत्मा को उसके शरीर के माध्यम से नोचने खसोटने का कृत्य अब उतना आसान नहीं रह गया है । और स्त्री ने इन कार्यों का पूरे जज्बे के साथ विरोध भी किया है । आज की स्त्री संघर्षशील, जुझारू और जज्बे वाली बनकर सामने आई है अब यह अलग बात है कि स्त्री वर्ग में ही लिव इन रिलेशन के नाम पर खुद अपने आप को धोखे में रखने एवं पुरुष के आगे परोसने वाली स्त्रियों की भी कमी नहीं है।
लेकिन स्त्री आज बदली भी बहुत है उसका स्वाभिमान जागा है और सहने या लडऩे के विकल्प में से उसने दूसरा विकल्प खुद चुना है हालांकि इस दूसरे विकल्प पर चलना कोई सरल काम नहीं था क्योंकि छाती पर सवार समाज, प्रथाएं व पुरूष आसानी से उसे उबरने नहीं दे रहे थे । इस षडय़ंत्र में नारी जगत का ही एक बड़ा हिस्सा भी डर, अज्ञान या अनजाने में शामिल हुआ और एक लंबे कालखंड तक यह कुचक्र सफल होता रहा पर समय के साथ स्त्री इस जाल की काट भी सीख गई है और आज वह पुरूष के बराबर और कई क्षेत्रों में तो उससे आगे भी खड़ी नजऱ आ रही है ।
तकनीकी आई, औरत छाई
स्त्री की उन्नति में सबसे बड़ी भूमिका उसकी शिक्षा व जीजिविषा ने निबाही है तो तकनीकी ने भी एक बड़ी भूमिका अदा की है। अब फिजिकल पावर या बाहुबल का ज़माना नहीं रहा है बल्कि तकनीकी काबिलियत ही असली ताकत बनकर उभरी है इस तरह मांस पेशीय बल पर इतराते पुरूष का वर्चस्व घटा है । आज तकनीकी का युग है और नारी के लिए यह बड़े काम का सिद्ध हुआ है। उसकी कोमल उंगलियां फर्राटे से कंप्यूटर पर जिस गति से चलती हैं उतनी गति व दक्षता से शायद मर्द की कठोर व लोच रहित उंगलियां नहीं चल पाती और कंप्यूटर के बढ़ते उपयोग व उसके दायरे में आते लगातार विस्तृत होते क्षेत्र ने नारी को नई ताकत व सामर्थ्य दी है ।
नए दौर की अप्रतिम स्त्री :
तकनीकी कुशलता के चलते आज की स्त्री बाइक व स्कूटी ही नहीं दौड़ा रहीं हैं बल्कि कार और विमान से होती हुई लड़ाकू जैट तक जा पहुँची हैं और यह उनके लड़ाका होने का सबूत भी है। खेलों में अब वह केवल हल्के फुल्के गेम नहीं खेलती अपितु मुक्केबाजी, कुश्ती, से होती हुई सूमो व डब्ल्यू डब्ल्यू ई तथा ग्रीको रोमन कुश्ती, फ्री स्टाइल कुश्ती, पर्वतारोहण, भारोत्तलन व एयर ड्राइविंग तक कर रही है । अमेरिका के बाद यूरोप से होती हुई वह भारतीय सेना के तीनों अंगों में आ चुकी है । बेशक यह नारी शक्ति के उभार का नया दौर है । अब वें ज़माने लद गए जब नारी को घर की शोभा बता कर उसे बाहर की खुली हवा में सांस लेने से रोका जाता था या उसे सलाम करने में पुरूष की हेठी होती थी। आज तो वह घर बाहर, दफ्तर खेत, खलिहान, ज़मीन, आसमान, रेगिस्तान, समंदर सब जगह अपनी छाप छोड़ चुकी है, अब वह बराबर कमाती है, डटकर काम करती है और अब सवाल महिला दिवस मनाने का नहीं, स्त्री शक्ति को उसका असली हक और सम्मान मिलने का है।
– डॉ0 घनश्याम बादल

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