संपूर्ण भारतवर्ष में प्रसिद्ध मां शाकम्भरी देवी शक्तिपीठ ऐसा शक्तिपीठ है, जिसके बारे में यह मान्यता है कि इस स्थान पर रहकर देवी ने एक सहस्र वर्षों तक हर माह के अंत में एक बार शाकाहार करते हुए घोर तप किया था। इस तीर्थ की स्थापना महाभारतकाल से पूर्व की मानी जाती है।
जनपद सहारनपुर जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में स्थित है मां शाकम्भरी देवी शक्तिपीठ। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य और शान्त वातावरण मन को अलौकिक सुख प्रदान करता है। लेखक को भी एक बार इस शक्तिपीठ के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। हरिद्वार से हम लोग बस द्वारा सहारनपुर होते हुए मां शाकम्भरी देवी के मन्दिर पर पहुंचे।
मन्दिर के ठीक सामने एक बरसाती नदी है जो वर्षा ऋतु में पानी से लबालब रहती है। मन्दिर के तीन ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़ हैं, जिन्हें शिवालिक पर्वतमाला कहा जाता है। मन्दिर के सामने धर्मशालाएं बनी हुई हैं जहां यात्रीगण ठहर सकते हैं। यहीं पर अस्थायी बाजार भी है, जिसमें प्रसाद, पूजा सामग्री, भक्ति संगीत, साहित्य सहित खाने-पीने के सामान भी आसानी से मिल जाते हैं।
मुख्य मन्दिर तक पहुंचने के लिए कुछ सीढ़ियां बनी हुई हैं, जिनसे होकर भक्तजन माता रानी के दर्शन करने पहुंचते हैं। यहां उन्हें मां शाकम्भरी के साथ-साथ माता भीमा देवी, भ्रामरी देवी और शताक्षी देवी के भी दर्शन होते हैं।
कहा जाता है कि मां शाकम्भरी के घोर तप की चर्चा सुनकर हजारों ऋषि-मुनि उनके दर्शनार्थ पहुंचे, तो मां शाकम्भरी ने शाकाहारी भोजन से ही उनका अतिथि सत्कार किया था। तभी से मां यहां विराजमान हैं। इस मन्दिर में अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं।
मन्दिर के संबंध में कहा जाता है कि शुंभ-निशुंभ नामक राक्षसों का वध करने के बाद देवी ने कहा था कि भविष्य में एक बार भारी वर्षा होने पर वह प्रकट होंगी और अपनी देह से इतना शाक उत्पन्न कर देंगी कि वर्षा होने तक संसार के प्राणों की रक्षा हो सके। इसी क्रम में, एक बार अकाल पड़ने पर त्राहि-त्राहि मची, तो ऋषियों ने देवी की आराधना की। प्रसन्न होकर देवी ने नेत्रों से जलधारा बरसायी, जो नौ दिनों तक चली। इससे धरती के सभी प्राणी तृप्त हो गए। उसी समय सराल नाम के फल की उत्पत्ति हुई, जो माता का प्रसाद माना जाता है।
नवरात्रि पर्व में यहां विशाल मेला लगता है और लाखों श्रद्धालु अपनी मनौतियां मांगने माता के दरबार में पहुंचते हैं। मुख्य मन्दिर से लगभग एक किलोमीटर पहले भैरों मन्दिर स्थित है। बिना इसके दर्शन के मां के दर्शन को पूर्ण नहीं माना जाता।
माता शाकम्भरी देवी मन्दिर की व्यवस्था जसमोर रियासत का राणा परिवार पारंपरिक रूप से करता आ रहा है। मन्दिर के चढ़ावे का मुख्य भाग इसी परिवार को मिलता है। इस मेले की व्यवस्था जिला पंचायत करती है, लेकिन भक्तों की भारी संख्या के कारण क्षेत्र में गंदगी फैल जाती है। जिला पंचायत ने यहां शौचालय बनवाए हैं, किंतु उनकी संख्या पर्याप्त नहीं है। मेला व्यवस्थापकों व भक्तों को स्वच्छता की ओर ध्यान देना होगा।
इस मातृशक्ति पीठ की मान्यता का अंदाजा श्रद्धालुओं की संख्या से सहज ही लगाया जा सकता है। यह एक ऐसा देवी मन्दिर है जिसकी स्थापना पर्वतीय क्षेत्र में है, किंतु मन्दिर तक पहुंचना सहज है। इस क्षेत्र में आकर मन को अलौकिक सुख मिलता है।
अनिल शर्मा ‘अनिल‘