पंचकूला वार्डबंदी में हंगामा! आरक्षण और जनसंख्या के आंकड़ों पर घमासान, गलत पीपीपी डेटा ने चुनावी जमीन हिला दी
Haryana News: पंचकूला नगर निगम चुनाव 2026 से पहले वार्डबंदी की प्रक्रिया बड़ी विवादों में घिर गई है। पहली आधिकारिक बैठक में कांग्रेस और जजपा पार्षदों ने पीपीपी (परिवार पहचान पत्र) के आंकड़ों को “भ्रमित और अविश्वसनीय” बताते हुए जोरदार विरोध किया। आरक्षण सूची, वर्गवार जनसंख्या और वार्ड के निर्धारण को लेकर इतना हंगामा हुआ कि बैठक को अंततः 10 दिसंबर तक स्थगित करना पड़ा।
महापौर की मांग पर नहीं मिला सटीक डेटा
140% बढ़ी जनसंख्या का रहस्य
जिला प्रशासन ने बताया कि 2011 की जनगणना में पंचकूला की जनसंख्या 2,67,413 थी। लेकिन पीपीपी नियमों के मुताबिक पंजीकृत मतदाताओं के 140% के आधार पर यह संख्या अचानक बढ़कर 2,91,024 तक पहुंचा दी गई। पिछड़ा वर्ग ‘ए’ की जनसंख्या 38,733 और पिछड़ा वर्ग ‘बी’ की 17,736 बताई गई—जिस पर पार्षदों ने गंभीर सवाल उठाए।
राजेश कुमार ने प्रशासन पर लगाए गंभीर आरोप
जजपा पार्षद राजेश कुमार ने कहा कि पीपीपी में हजारों एससी और बीसी नागरिकों को सामान्य श्रेणी में दिखा दिया गया है। उनका आरोप है कि जानबूझकर आंकड़ों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है, जिससे वार्डबंदी प्रभावित होगी। उन्होंने कहा कि कई परिवार अभी तक पीपीपी में दर्ज ही नहीं हुए हैं।
वार्डों में जनसंख्या सीमा तय
प्रशासन ने बताया कि हर वार्ड में 11,000 से 17,000 की जनसंख्या और 10–12 मतदान केंद्र होंगे। लेकिन पार्षदों ने कहा कि जब मूल जनसंख्या डेटा ही गलत है, तो यह योजना भी अविश्वसनीय हो जाती है। महापौर ने निर्देश दिए कि पूरे शहर का वार्ड-वार डेटा दोबारा बनाया जाए।
महिलाओं के लिए सात वार्ड आरक्षित
सात वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं। इनमें एक एससी महिला, एक बीसी (ए) महिला, एक बीसी (बी) महिला और चार सामान्य श्रेणी की महिलाएं शामिल हैं। कांग्रेस पार्षद गौतम प्रसाद ने कहा कि बीसी ए और बीसी बी दोनों श्रेणियों की सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना असंतुलित है—एक पुरुष और एक महिला आरक्षित होना चाहिए था।
नए वार्ड भाजपा के लिए चुनौती बने?
चर्चा है कि नई वार्डबंदी में ग्रामीण और कॉलोनी क्षेत्रों की जनसंख्या शहरी वार्डों से ज्यादा दिखाई जा रही है। पिछले चुनावों में भाजपा को इन क्षेत्रों से कमजोर समर्थन मिला था। ऐसे में अगर शहरी वार्ड गांवों से जोड़े गए, तो भाजपा के उम्मीदवारों के लिए जीतना कठिन हो सकता है।
जातिगत विसंगतियों पर सबसे ज़्यादा विवाद
गौतम प्रसाद ने कहा कि बड़ी संख्या में एससी-बीसी नागरिकों को सामान्य वर्ग में डालकर आंकड़े पूरी तरह गलत हो गए हैं। कई लोग अपने पीपीपी डेटा में सुधार कराने के लिए महीनों से सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन सुधार की प्रक्रिया बेहद धीमी है। एक अधिकारी ने दावा किया कि यूपी और बिहार से आए लोगों को सामान्य वर्ग में गिना जाएगा-जिस पर भी तीखा विरोध हुआ।
