तुम्हारे रोने-चिल्लाने से प्रारब्ध का दुख भोग मिट नहीं जायेगा। बड़ी भारी चाह तथा चिंता करने से भोग सुख मिल नहीं पायेगा, परन्तु यदि तुम दुख में सुख तथा लाभ बुद्धि कर लोगे और सुख में दुख तथा हानि बद्धि कर लोगे तो सांसारिक दुखों की प्राप्ति में उद्वेग या क्लेश नहीं होगा और सुखों की आकांक्षा या अभिलाषा भी नहीं होगी। तुम दोनों में ही निर्विकार और प्रसन्न रहोगे। जीवन सुख की खोज में मारा-मारा फिर रहा है। सुख धन की तिजौरी में है अथवा शरीर के भोगों में, वह जप तप में है अथवा धर्म कर्म में, वह ज्ञान ध्यान में है या वेद शास्त्रों के अध्ययन में, योगाभ्यास में है या कर्म विकर्म में? बुद्धिमान वह है जो इस रहस्य को समझ लेता है कि सच्चा सुख दूसरों के सुख का हेतु बनने में है। भोग सुख की इच्छा ही सारे दुखों का मूल है। इसी के कारण मनुष्य नाना प्रकार के दुष्कर्म करता है, फलस्वरूप बार-बार निराश, उदास और कत्र्तव्य विमुख होकर आत्म विनाश के पथ पर चलता है। यदि भोग सुख की हानियों से मनुष्य परिचित हो जायें और उन्हें सदैव स्मरण रखे तो वह भोग सुख के लिए कभी ललचायेगा ही नहीं।