व्रत, उपवास और पूजा-पाठ हिंदू धर्म की पहचान हैं । उसकी यह विशेषता उसे अन्य धर्मों से विशिष्ट बनाती है । वर्ष में एक से अधिक बार ऐसे अवसर आते हैं जब श्रद्धालु हिंदू एक या दो दिन नहीं बल्कि कई कई दिन व्रत एवं उपवास करके अपने इष्ट देव या देवियों को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं ऐसा ही एक अवसर है चैत्र नवरात्र ।
चैत्र नवरात्री में आठवां नवरात्र दुर्गा अष्टमी के नाम से जाना जाता है । भक्तजन आठवें दिन महागौरी की पूजा कर उनसे जीवन को सफल और सकारात्मक बनाने का आशीर्वाद मांगते हैं । बहुत से भक्त इस दिन कन्या पूजन कर अपना व्रत खोल लेते हैं।
महागौरी परिचय
पुराणों में मां गौरी का विवरण इस तरह मिलता है ।महागौरी सफेद रंग के बैल पर सवार हैं , श्वेत वस्त्र धारण करती हैं । मान्यता है कि उनका जन्म महादेव को प्रसन्न करने के लिए हुआ है। यें पूर्णतः गौर वर्ण है और इनकी उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। ‘अष्टवर्षा भवेद् गौरी’ से स्पष्ट है कि इनकी आयु आठ साल मानी गई है। इनके सभी आभूषण और वस्त्र सफेद हैं। इसीलिए उन्हें श्वेताम्बरा भी कहा जाता है। माता महागौरी पार्वती का ही रूप हैं।
देवीभागवत पुराण के अनुसार, मां के नौ रूप और दस महाविद्याएं सभी आदिशक्ति के अंश और स्वरूप हैं लेकिन भगवान शिव के साथ उनकी अर्धांगिनी के रूप में महागौरी सदैव विराजमान रहती हैं। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। मान्यता है कि मां गौरी की कृपा से मनुष्य का चरित्र भी उज्ज्वल हो जाता है। माता की चार भुजाओं में से। एक हाथ वर मुद्रा है, एक अभय मुद्रा । एक हाथ में भगवान शिव का वाद्य यंत्र डमरू है तो एक हाथ में त्रिशुल है, भले ही मां गोरी के हाथों में भगवान रुद्र के दो शस्त्र हैं लेकिन महागौरी अत्यंत शांत और गंभीर हैं।
महागौरी की उत्पत्ति
मिथकों के अनुसार सती ने आत्मदाह के बाद पार्वती के रूप में दूसरा जन्म लिया था। पार्वती ने शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप किया। जब शिव अत्यंत तपश्चर्या के बाद भी प्रकट नहीं हुए, तो पार्वती ने अन्न-जल त्याग कर शिव की उपासना शुरू की इससे पार्वती का शरीर अत्यंत काला और दुर्बल हो गया। माना जाता है कि उनके इसी रूप से कौशिकी देवी का जन्म हुआ था। जब भगवान शिव को पार्वती के घोर तप का पता चला तो उन्होंने पार्वती को दर्शन देकर उनकी मनोकामना पूरी करने का वरदान दिया और स्वयं शिव ने गंगाजल से पार्वती को स्नान करवाया। इसके वे अत्यंत उज्ज्वल हो गईं। देवी पार्वती के इसी रूप को महागौरी कहा जाता है। मान्यता है कि इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियां भी प्राप्त होती हैं।
पूजा का फल
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार महागौरी की पूजा से शुक्र से संबंधित समस्त दोष दूर हो जाते हैं। विवाह संबंधी समस्या होने पर भी महागौरी की पूजा करनी चाहिए। ऐसा माना जाता है कि माता सीता ने भी राम को पति रूप में पाने के लिए महागौरी की पूजा की थी। और माता के आशीर्वाद से उन्हें श्रीराम जैसा विष्णु का अवतार वर प्राप्त हुआ इसीलिए नवरात्रों के अवसर पर जो कन्याएं मनोवांछित वर प्राप्त करना चाहती हैं उनसे विशेष रूप से नवरात्र की अष्टमी को व्रत रखने के लिए कहा जाता है यदि सच्चे मन से मां गौरी की अराधना करते हुए अपने योग्य वर मांगती है तो उनकी इच्छा अवश्य पूरी होती है।
पूजन विधि :
महागौरी पूजा से पहले घर में नवरात्रि में स्थापित कलश, गणेश, गौरी और नवग्रह की पूजा करनी चाहिए। तत्पश्चात महागौरी का आह्वान करके उन्हें स्नान, ध्यान, फल, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य से प्रसन्न करके दुर्गासप्तशती के मंत्रों का विशेष पाठ करना चाहिए। महागौरी के किसी भी एक मंत्र का 108 बार पाठ करना उचित हैऔर अष्टमी को कन्याओं को भोजन जरूर करवाना चाहिए। माता महागौरी को खीर और हलवे का भोग बहुत पसंद है उन्हें यह भोग जरूर अर्पित करना चाहिए। साथ ही साथ नारियल या नारियल से बनी हुई वस्तुओं का भूख भी माता को कन्याओं को प्रसाद स्वरूप देकर लगाना चाहिए मां को लाल रंग के पुष्प विशेष दी है अतः उनके सहायकों को चढ़ाने से मां अत्यंत प्रसन्न होती हैं ।
महागौरी मंत्र
जीवन में सफलता प्राप्त करने तथा मां गौरी को प्रसन्न करने के लिए इस मंत्र का 108 बार जाप करना विशेष फलदाई माना जाता है
या देवी सर्वभूतेषु मां गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।।
महागौरी की प्रसन्नता के लिए सिद्ध कुंजिका स्तोत्र, महागौरी स्तोत्र या कवच का पाठ करना अच्छा रहता है। हर व्यक्ति को जीवन में प्रसन्नता, आर्थिक उन्नति, सफलता, लाभ और धर्म की प्राप्ति के लिए नवरात्रि के आठवें दिन माता महागौरी की पूजा अवश्य करनी चाहिए। मान्यता है कि पूजन के साथ-साथ तन, मन तथा कर्म की शुद्धता का होना भी आवश्यक है इसीलिए महागौरी की पूजन के लिए तन व मन को विशेष रूप से पवित्र रखना चाहिए।
डॉ घनश्याम बादल