चैत्र शुक्ल नवमी का दिन केवल भगवान श्रीराम के जन्म का उत्सव ही नहीं बल्कि उनके जीवन से प्रेरणा लेने का अवसर भी है। उनका चरित्र केवल धर्म और मर्यादा तक सीमित नहीं था बल्कि उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में हमें जीवन जीने की नई दृष्टि दी। श्रीराम के जीवन को केवल एक पौराणिक कथा मानना उनकी गहराई को कम करके आंकने जैसा होगा। वास्तव में, वे एक आदर्श पुत्र, आदर्श शासक, आदर्श योद्धा और आदर्श मानव के रूप में हमें जीने की कला सिखाते हैं। आइए, उनके जीवन के कुछ महत्वपूर्ण प्रसंगों से प्रेरणा लें।
धैर्य और संयम: परिस्थितियाँ कैसी भी हों, आत्मनियंत्रण न खोएं
जब कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने वरदान स्वरूप राम के लिए 14 वर्षों का वनवास मांगा, तब वे सहजता से इसे स्वीकार कर लेते हैं। न कोई विरोध, न कोई क्रोध, बस एक संतुलित और मर्यादित प्रतिक्रिया। यह हमें सिखाता है कि जीवन में कठिन परिस्थितियों का सामना धैर्य और संयम से करना चाहिए। हर परिस्थिति में हमारा आचरण ही हमें महान बनाता है।
कर्तव्य के प्रति निष्ठा: अपने कर्तव्य को सर्वोपरि रखें
जब समुद्र लांघने से पहले श्रीराम समुद्र देवता से प्रार्थना करते हैं और तीन दिन तक प्रतीक्षा करते हैं, तब यह उनके धैर्य और न्यायप्रियता को दर्शाता है। परंतु जब समुद्र देवता उत्तर नहीं देते, तो वे क्रोध में आकर अपने धनुष को उठाते हैं। यह घटना हमें सिखाती है कि धैर्य आवश्यक है लेकिन जब अन्याय या बाधा सामने आए तो उचित समय पर कठोर निर्णय लेना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
संबंधों की मर्यादा: रिश्तों में सम्मान और त्याग का संतुलन बनाए रखें
श्रीराम का जीवन पारिवारिक मूल्यों की सर्वोत्तम मिसाल है। लक्ष्मण उनके प्रति पूर्ण समर्पित थे, परंतु जब उन्होंने लक्ष्मण को त्यागने का कठिन निर्णय लिया, तो यह केवल व्यक्तिगत भावनाओं से परे जाकर कर्तव्य का निर्वहन था। यह हमें सिखाता है कि भावनाएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जब धर्म और कर्तव्य की बात हो, तो हमें निष्पक्ष निर्णय लेने के लिए तैयार रहना चाहिए।
नेतृत्व और निर्णय क्षमता: एक सच्चा नेता कैसा होना चाहिए?
लंका विजय के बाद जब विभीषण को राजा घोषित किया गया, तब श्रीराम ने यह सुनिश्चित किया कि उनके शासन में न्याय और नीति का पूर्ण पालन हो। वे अपने अनुयायियों को कभी अन्याय करने की अनुमति नहीं देते, न ही वे स्वयं अहंकार में आते हैं। उनका नेतृत्व हमें सिखाता है कि एक सच्चे राजा या नेता को अहंकार से दूर रहना चाहिए और प्रजा के कल्याण को सर्वोपरि रखना चाहिए।
रामराज्य: एक आदर्श समाज की परिकल्पना
श्रीराम का शासन ‘रामराज्य’ सिर्फ एक स्वर्णिम युग नहीं, बल्कि एक ऐसी विचारधारा है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के हितों की रक्षा होती है। इसमें सत्य, न्याय और समानता की प्रधानता थी। यह हमें सिखाता है कि एक सशक्त समाज वही होता है, जहाँ हर नागरिक को समान अवसर और सम्मान मिले।
श्रीराम के आदर्शों को अपनाएँ
आज, जब समाज अनेक नैतिक और सामाजिक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब श्रीराम के जीवन से हमें सही दिशा मिल सकती है। उनके आदर्श हमें सिखाते हैं कि सत्य, कर्तव्य, धैर्य और न्याय के मार्ग पर चलकर ही हम एक सभ्य और संतुलित समाज की स्थापना कर सकते हैं। इस राम नवमी, केवल उनकी आराधना करने के बजाय, उनके सिद्धांतों को आत्मसात करने का संकल्प लें। यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
जय श्रीराम!
-उमेश कुमार साहू