जॉर्ज यिओ का बड़ा दावा: ट्रम्प का 'डोनरो सिद्धांत' खत्म कर रहा है अमेरिकी वर्चस्व; दुनिया बन रही है बहुध्रुवीय
नयी दिल्ली। सिंगापुर के पूर्व विदेश मंत्री और प्रमुख रणनीतिक विचारक जॉर्ज योंग-बून यिओ का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नयी 'डोनरो डॉक्ट्रिन' वैश्विक व्यवस्था को बहु-ध्रुवीय दुनिया की ओर तेजी से ले जा रही है।
भारत और आसियान के बीच करीबी रिश्तों का हमेशा से समर्थन करने वाले यिओ ने कहा, "भारत के लिए खुद की रक्षा करना और आर्थिक विकास पर ध्यान देना सबसे अच्छा होगा। आखिर में, आर्थिक ताकत, सैन्य ताकत से ज़्यादा बड़ी होती है।" येओ, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के हर साल आयोजित होने वाले सी.डी. देशमुख मेमोरियल लेक्चर देने के लिए यहां आए हुए हैं।
उन्होंने कहा, "ट्रम्प (ग्लोबल ऑर्डर) के भविष्य को तेज़ी से आगे बढ़ा रहे हैं... बहु ध्रुवीय व्यवस्था की ओर" और इसके परिणामस्वरूप भारत और चीन, जो एक-दूसरे का सम्मान करते हैं, शायद "अपने रिश्तों को स्थिर कर लें।"
यिओ ने संकेत दिया कि एक समय भारत के नेतृत्व को लगा था कि चीन के खिलाफ अमेरिका उसका प्रमुख सहयोगी होगा। हालांकि, अप्रैल 2025 में कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने भारत का समर्थन करने के बजाय पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व को व्हाइट हाउस में आमंत्रित किया। अमेरिका के इस कदम से भारत को काफी निराशा हुई थी।
उनके अनुसार, ट्रम्प भविष्य की बहु-ध्रुवीय व्यवस्था को तेजी से आगे बढ़ा रहे हैं और इसी कारण भारत और चीन अपने रिश्तों को स्थिर कर सकते हैं।
पद्म भूषण से सम्मानित यिओ ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने सोचा था कि वह आयात शुल्क के मुद्दे पर भारत को दबा सकते हैं, लेकिन भारत ने इसे स्वीकार नहीं किया। इसी तरह, चीन के मामले में भी आयात शुल्क की धमकी काम नहीं आई क्योंकि चीन ने 'रेयर अर्थ तत्वों के कार्ड का इस्तेमाल किया, जिससे अमेरिका को पीछे हटना पड़ा।
यिओ का मानना है कि भारत और चीन के बीच परिपक्व संबंध हैं और दोनों प्राचीन सभ्यताएं एक-दूसरे का सम्मान करती हैं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर भले ही कभी-कभी तनाव दिखे, लेकिन दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व ने कभी एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी नहीं की है।
ताइवान के खिलाफ चीन के सैन्य अभ्यास पर अमेरिकी राष्ट्रपति के अस्पष्ट रुख का जिक्र करते हुए यिओ ने कहा कि ऐसी स्थिति में चीन, ताइवान, जापान और भारत जैसे देश अपने सभी विकल्प खुले रखेंगे। उन्होंने सुझाव दिया कि भारत के लिए सबसे अच्छा यही होगा कि वह खुद की रक्षा करे और आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करे। उनके अनुसार, अंततः सैन्य शक्ति की तुलना में आर्थिक शक्ति कहीं अधिक बड़ी होती है।
