"निस्वार्थ दान और पुण्य कर्म: जीवन का सच्चा मार्ग"
देशभर में आध्यात्मिक गुरु और संतों के प्रवचनों में हमेशा दूसरों को देने की भावना को बनाए रखने पर जोर दिया जाता रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि मन में जब किसी धर्म कार्य या अभावग्रस्त की सहायता करने की इच्छा उत्पन्न हो, तो उसे तुरंत पूरा करना चाहिए। विलम्ब करने से भावनाएं क्षणिक हो जाती हैं और पुण्य कार्य का प्रभाव कम हो सकता है।
दिए जाने वाले कार्य में न तो पीछे मुड़कर देखने की आवश्यकता है और न ही कार्य के बाद पश्चाताप करने की। ऐसा करने से व्यक्ति का दुर्भाग्य बढ़ सकता है। यदि व्यक्ति सक्षम है और हृदय में श्रद्धा है, तो वह देने वाला बन सकता है। वहीं यदि व्यक्ति समर्थ नहीं भी है, तो मन में प्रभु के प्रति प्रेम और श्रद्धा रखते हुए सबके कल्याण की प्रार्थना की जा सकती है।
आध्यात्मिक विद्वानों का कहना है कि पुण्य कार्य करते समय प्रभु का ध्यान मन में बनाये रखना चाहिए। देने की मात्रा कम या ज्यादा हो, यह प्रभु की मर्जी पर निर्भर है, लेकिन श्रद्धा और समर्पण से किया गया कार्य निश्चित रूप से फलदायी होता है। प्रभु सबका ख्याल रखते हैं और सच्ची श्रद्धा रखने वालों को उसका प्रतिफल अवश्य मिलता है।
