यूनेस्को ने विद्यार्थियों को परोसे जाने वाले भोजन यानि मिड-डे-मील में न्यूट्रिएंट की कमी पर चिंता जताते हुए स्वस्थ और अधिक पौष्टिक खाद्य पदार्थों के उपयोग और स्कूली पाठ्यक्रम में खाद्य शिक्षा को शामिल करने की वकालत की है। यूनेस्को की रिपोर्ट बच्चों के स्वास्थ्य और सीखने में स्कूली भोजन के महत्व को रेखांकित करती है। 27 और 28 मार्च को फ्रांस द्वारा आयोजित ‘पोषण के लिए विकास सेमिनार के अवसर पर यूनेस्को ने परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता पर
ध्यान केंद्रित करते हुए एक नई रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट से पता चलता है कि 2022 में दुनिया भर में लगभग करीब 27 फीसदी स्कूली भोजन पोषण विशेषज्ञों के परामर्श से तैयार नहीं किए गए थे। मूल्यांकन किए गए 187 देशों में से केवल 93 देशों में स्कूल के भोजन और पेय पर कानून, मानक या दिशा-निर्देश थे और इन 93 देशों में से केवल 65 फीसदी में स्कूल कैफेटेरिया, खाद्य दुकानों और वेंडिंग मशीनों में भोजन और पेय की बिक्री को नियंत्रित करने वाले मानक थे।
यूनेस्को महानिदेशक ऑड्रे अज़ोले के अनुसार हाल के वर्षों में किए गए निवेशों की बदौलत दुनिया के लगभग आधे प्राथमिक विद्यालय के विद्यार्थियों को अब स्कूली भोजन उपलब्ध है लेकिन हमें और आगे जाकर यह देखने की ज़रूरत है कि उनकी थाली में क्या है। हमें संतुलित भोजन और बच्चों को स्वस्थ रहने के लिए अच्छी खाने की आदतें सिखाने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। यह स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए एक बड़ा मुद्दा है। खाद्य शिक्षा के लिए यूनेस्को के
सद्भावना राजदूत डेमियन हम्म के अनुसार स्कूल एक ऐसा स्थान होना चाहिए जहां स्वस्थ आदतें विकसित की जाएं न कि उन्हें कमतर आंका जाए। स्थानीय रूप से उत्पादित, ताज़ा स्कूली भोजन खाना, पोषण विशेषज्ञों द्वारा दिया जाना बच्चे की शिक्षा का हिस्सा है।
ताजा और न्यूनतम प्रसंस्कृत भोजन को प्राथमिकता
अपनी रिपोर्ट में यूनेस्को ने स्कूल में पोषण में सुधार के लिए कई सकारात्मक पहलों पर प्रकाश डाला है। ब्राज़ील ने हाल ही में अल्ट्रा.प्रोसेस्ड उत्पादों पर प्रतिबंध लगाए हैं। चीन में ग्रामीण स्कूलों में सब्जियां, दूध और अंडे शुरू करने वाले सुधारों ने बच्चों के पोषक तत्वों के सेवन में वृद्धि की है और स्कूल में उपस्थिति बढ़ाने में मदद की है। नाइजीरिया में
2014 में शुरू किए गए होम-ग्रोन स्कूल फीडिंग प्रोग्राम ने प्राथमिक स्कूल में नामांकन दर में 20 फीसदी की वृद्धि की है। भारत में महाराष्ट्र राज्य में स्कूल के भोजन में आयरन से भरपूर फोर्टिफाइड ऑर्गेनिक मोती बाजरा की शुरूआत ने किशोरों की ध्यान अवधि और याददाश्त में सुधार किया है। यूनेस्को की मंशा है कि सरकारों और शिक्षा हितधारकों को ताजा, स्थानीय उपज पर आधारित स्कूल भोजन प्रदान करने और शर्करायुक्त और अति प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की उपस्थिति को कम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। स्कूल पाठ्यक्रम में खाद्य शिक्षा को शामिल किया जाना चाहिए। इस वर्ष यूनेस्को सरकारों और शिक्षा पेशेवरों के लिए इन स्वास्थ्य और पोषण मुद्दों को बेहतर ढंग से एकीकृत करने के उद्देश्य से उपकरणों की एक श्रृंखला विकसित करेगा जिसमें एक व्यावहारिक मैनुअल और एक प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल है।
शिक्षा और पोषण का है सीधा संबंध
रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक खाद्य असुरक्षा एक बढ़ता हुआ जोखिम है जो जलवायु परिवर्तन संघर्ष और आर्थिक अस्थिरता से और भी बढ़ गया है। इस बीच खाद्य उत्पादन प्रथाओं अस्वास्थ्यकर आहार पैटर्न के विपणन और गतिहीन जीवन शैली के कारण मोटापे की दर में वृद्धि हुई है। खाद्य सुरक्षा बेहतर पोषण शैक्षिक उपलब्धि को बढ़ाता है। पर्याप्त प्रारंभिक बचपन का पोषण विकास, शैक्षिक प्राप्ति और समग्र कल्याण के लिए मौलिक है। पौष्टिक स्कूली भोजन और अनुभवात्मक सीखने के अवसर प्रदान करने वाली शैक्षिक व्यवस्थाएँ व्यक्तियों को ऐसे आहार विकल्पों को अपनाने में मदद करती हैं जो व्यक्तिगत स्वास्थ्य और ग्रहीय स्थिरता दोनों के लिए लाभकारी हों। स्पष्ट अंतरनिर्भरता के बावजूद शिक्षा और पोषण के बीच संबंधों पर अभी भी कम शोध किया गया है।
भारत: मद्रास नगर निगम ने 1925 में ही कर दी थी शुरुआत
भोजन और शिक्षा भारत की गरीब आबादी के बीच चिंता के दो सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। सीमित साधनों के साथ रहने वाले लोगों के पास खाद्य संसाधनों तक सीमित पहुंच होती है और वे शायद ही कभी औपचारिक शिक्षा में दाखिला लेते हैं। बच्चे जो भारत का भविष्य हैं, निम्न आय वर्ग से संबंधित हैं, उन्हें ये दो बुनियादी ज़रूरतें नहीं मिलती हैं। इसलिए शिक्षा को बढ़ावा देने और बच्चों को बुनियादी पोषण प्रदान करने के लिए भारत सरकार द्वारा मध्याह्न भोजन योजना शुरू की गई थी। इस योजना को आधिकारिक तौर पर प्राथमिक शिक्षा के लिए पोषण सहायता का राष्ट्रीय कार्यक्रम कहा जाता था। सितंबर 2021 में कार्यक्रम का नाम बदलकर पीएम पोषण कर दिया गया। यूं तो मध्याह्न भोजन योजना आधिकारिक तौर
पर 15 अगस्त 1995 को शुरू की गई थी, लेकिन इसका इतिहास स्वतंत्रता पूर्व काल से जुड़ा हुआ है। मद्रास नगर निगम में वर्ष 1925 में वंचित बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन कार्यक्रम शुरू किया गया था। 1980 के दशक के मध्य तक मध्याह्न भोजन कार्यक्रम केरल, गुजरात, तमिलनाडु और पांडिचेरी के स्कूलों में एक आम बात बन गई। इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था करने के लिए अपने स्वयं के संसाधनों का उपयोग किया।
वर्ष 1990-91 तक मध्याह्न भोजन कार्यक्रम अपनी लोकप्रियता और सार्वभौमिक प्रासंगिकता के कारण भारत के 12 राज्यों में लागू किया गया था। अगस्त 1995 में इस योजना को प्राथमिक शिक्षा के लिए पोषण सहायता के राष्ट्रीय कार्यक्रम
के नाम से आधिकारिक तौर पर शुरू किया गया। 1995 में यह योजना भारत में केवल 2048 ब्लॉकों में शुरू की गई थी। वर्ष 1997-98 तक यह योजना देश के सभी भागों में लागू हो गई। शुरू में इस योजना में सरकारी स्कूलों, सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों या स्थानीय स्कूलों में कक्षा 1 से 5 में पढऩे वाले बच्चे शामिल थे। 2002 में इस योजना को शिक्षा गारंटी योजना और वैकल्पिक और अभिनव शिक्षा केंद्रों में पढऩे वाले बच्चों को शामिल करने के लिए विस्तारित किया गया था। अक्टूबर 2007 में लगभग 1.7 करोड़ अतिरिक्त बच्चों को इस योजना के तहत शामिल किया गया।
हमारे यहां समुदाय की भागीदारी बढ़ाने का भी हो रहा प्रयास
तिथि भोजन की अवधारणा एक नई अवधारणा है जिसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शुरू किया गया है। इस पहल का उद्देश्य मध्याह्न भोजन कार्यक्रम के अंतर्गत समुदाय की भागीदारी को बढ़ाना भी है। हालांकि, योजना के अंतर्गत आने वाले बच्चों की माताओं को प्रोत्साहित करने के बजाए तिथि भोजन का उद्देश्य समुदाय के सदस्यों को मध्याह्न भोजन योजना में भाग लेने और योगदान देने के लिए शामिल करना है। तिथि भोजन की अवधारणा को सबसे पहले गुजरात में लागू किया गया था और उसके बाद इसे सभी भारतीय राज्यों में लोकप्रिय बनाया गया। इस अवधारणा का उद्देश्य समुदाय के सदस्यों
को मध्याह्न भोजन कार्यक्रम में स्वेच्छा से योगदान करने के लिए लक्षित करना है। किसी विशेष त्यौहार या अवसर पर रसोई के बर्तन या भोजन के रूप में योगदान दिया जा सकता है। इसके अलावा, इच्छुक सदस्य बच्चों को पहले से दिए जा रहे भोजन के अलावा स्नैक्स, मिठाई, अंकुरित अनाज आदि जैसे पूरक भोजन भी दे सकते हैं। धार्मिक और धर्मार्थ संस्थाओं को भी तिथि भोजन योजना में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि बच्चों को बेहतर भोजन मिल सके।
पुनीत उपाध्याय