हम भजन करते हैं, व्रत, रोजे रखते हैं, मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरूद्वारे भी जाते हैं, परन्तु मन मंदिर को साफ-सुथरा रखने पर ध्यान नहीं देते। इसलिए बाहर के मंदिरों में ही घूमते रह जाते हैं। इससे प्राप्त कुछ होता नहीं।
तुम इन ईंट-गारे के मंदिर-मस्जिद में भले ही जाओ, साधना कक्ष में भले ही अभ्यास करो, परन्तु मन मंदिर में पहुंचने का प्रयास अवश्य करो। ईश्वर सर्वत्र है, सदा है, आप में ही है, मुझमें भी है, वह सब प्राणियों में है। यदि आप किसी से द्वेष करते हैं, घृणा करते हैं तो उसके भीतर बैठे हुए परमात्मा के प्रति भी आप घृणा और द्वेष करते हैं। किसी से आपके विचार नहीं मिलते तो नहीं मिलते, परन्तु जो भी मिलते हैं उन्हीं के आधार पर उनसे स्नेह करो।
यदि स्नेह करने में अपने स्वाभाव के अनुसार असमर्थ हो तो उनके प्रति घृणा और द्वेष का भाव तो पैदा ही न होने दें। कोई मूर्ख हो अथवा आध्यात्म का जानकार पंडित या कोई उपदेशक हो, परन्तु उनके भीतर काम, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष के भाव मौजूद हैं तो ये सभी एक समान है, क्योंकि मूर्ख भी अपनी आयु बेचकर जी रहा है और आध्यात्म का पंडित एवं उपदेशक भी संसार के दलदल में फंसकर अपनी आयु गंवा रहे हैं।