केवल पूजा-अर्चना कर और कथा प्रवचन सुनने मात्र से मनोवांछित फल की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसके लिए तो उसी प्रकार का धर्मनिष्ठ आचरण तथा पुरूषार्थ जरूरी है। बिना पुरूषार्थ अच्छे फल की प्राप्ति ‘उसके’ बनाये नियमों के विरूद्ध है। वह न्यायकारी है तो ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी व्यक्ति का परिश्रम इसलिए रंग न लाये कि उसने पूजा-अर्चना नहीं की। अर्चन पूजन से धर्मयुक्त कर्म की प्रेरणा मिलती है, परन्तु जिसने अपने कर्म को ही पूजा बना लिया, वह तो सबसे बड़े धार्मिकों को श्रेणी में आता है। प्रत्येक व्यक्ति को एक सहारे की आवश्यकता होती है। ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करके उसे किसी न किसी रूप में मनुष्य अपने आपको सर्वशक्तिमान परमात्मा से जोड लेता है। उसकी सर्वव्यापकता हर समय हमारा मार्ग दर्शन जो करती है। अपनी आत्मा के माध्यम से वह अपने कर्मों में धर्म-अधर्म का भेद कर सकता है। उसकी कृपा से अपने सत्पुरूषार्थ द्वारा धर्म के मार्ग पर चलकर मनोवांछित की प्राप्ति भी कर सकता है। सत्य निष्ठा से सत्पुरूषार्थ द्वारा अपने मानवीय कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों को पूरा करते रहना भी ईश्वर भक्ति है और इनसे विमुख रहकर कितना भी पूजा-पाठ किया जाये सब व्यर्थ है।