रिश्तों की बात करे तो सभी रिश्ते महत्वपूर्ण हैं, अनमोल हैं और सम्मान भी सभी रिश्तों का होना चाहिए। भगवान ने तो रिश्तों की माला ही पिरो दी जैसे मां-बेटी, पति-पत्नी, माता-पिता, मामा-मामी, चाचा-चाची, बहन-भाई, पिता-पुत्री, पिता-पुत्र, दादा-दादी, पोता-पोती, बुआ-फूफा, ताऊ-ताई जैसे अनेक रिश्ते परिवार में जुड़ जाते हैं। दो परिवारों को जोड़ती है नारी। बचपन में बेटी के रूप में मां-बाप की मर्यादा और सम्मान की सुरक्षा के प्रति सचेत रहने वाली बेटी अपने माता-पिता से प्राप्त संस्कारों को लेकर ससुराल में जाती है। वह दोनों परिवारों की अस्मिता पर आंच न आये यह ध्यान रखती है। फिर पति, सास, स्वसुर की सेवा करते बच्चों के पालन-पोषण का दायित्व, उन्हें अच्छे संस्कार देना सब उसकी जीवन चर्या का एक स्वभाविक अंग बना रहता है। परमात्मा ने नारी को ममता की मूरत और गुणों की खान बनाया। धरती की तरह सहनशील आकाश की भांति स्वतंत्र, वायु से हल्की, पानी जैसी निर्मल, किन्तु विपत्ति में पाषाण से भी दृढ बनाया, परन्तु समय के साथ सभी की प्रवृत्ति में परिवर्तन आया है और यह परिवर्तन परिवारों और समाज के लिए शुभ नहीं। आज के युग में हम दो हमारे दो ने रिश्तों का सर्वनाश कर दिया। अब तो नौबत केवल एक पर आ गई है। यदि ऐसा ही होता रहा तो बुआ-फूफा, मौसा-मौसी, जीजा-साली जैसे रिश्ते बीते काल की बात हो जायेगी। इस समस्या पर गम्भीरता से विचार किया जाये।