नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने सजायाफ्ता दोषियों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग का विरोध करते हुए मौजूदा छह वर्ष के प्रतिबंध को पूरी तरह सही ठहराया है। केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफनामा दाखिल करते हुए स्पष्ट किया कि चुनावी अयोग्यता से जुड़े कानून बनाना संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसमें न्यायिक हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
पश्चिम में हाईकोर्ट की पीठ बनाने की मांग फिर उठी, कई विधायकों ने भी उठाया मामला
यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चार मार्च को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दाखिल की गई थी, जिसमें सजायाफ्ता नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि लोकतंत्र में अपराधियों का राजनीति से दूर रहना अनिवार्य है, इसलिए दोषी ठहराए गए व्यक्तियों को आजीवन चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। इस पर केंद्र सरकार ने अपने जवाबी हलफनामे में तर्क दिया कि यह एक तरह से कानून के पुनर्लेखन की मांग है, जो न्यायिक समीक्षा के क्षेत्र से बाहर है।
मुज़फ्फरनगर में छात्रों के दो गुटों में मारपीट, बढ़ा तनाव, भाकियू ने मामला सुलझाने की शुरू की पहल
सरकार ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट किसी भी कानून को न्यायिक समीक्षा के तहत असंवैधानिक ठहरा सकता है, लेकिन कानून को दोबारा लिखने या नया कानून बनाने का अधिकार केवल संसद के पास है।
सरकार ने कहा कि कोर्ट यह तय नहीं कर सकता कि संसद को कानून बनाते समय किस प्रकार का प्रावधान जोड़ना चाहिए। किसी दोषी को आजीवन चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने का निर्णय पूरी तरह से संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।”
सरकार ने मौजूदा कानूनों को पूरी तरह संवैधानिक और तर्कसंगत बताया। जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 8(3) के तहत, किसी भी व्यक्ति को यदि दो साल या उससे अधिक की सजा मिलती है, तो वह सजा पूरी होने के बाद छह साल तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य रहता है।
सरकार ने कहा कि आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग असंगत है, क्योंकि सजा पूरी करने के बाद व्यक्ति को अपने नागरिक अधिकार पुनः प्राप्त करने का हक होता है। इस संदर्भ में सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 का हवाला देते हुए बताया कि यदि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ, दिवालिया या भारत का नागरिक नहीं रहता, तो वह अयोग्य हो जाता है, लेकिन जैसे ही ये परिस्थितियां समाप्त होती हैं, उसकी अयोग्यता भी खत्म हो जाती है।
सरकार ने कहा कि दंड और अयोग्यता के बीच एक संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। कोई भी दंड अपराध की गंभीरता के अनुरूप होना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति अपनी सजा पूरी कर चुका है, तो उसे समाज में दोबारा शामिल होने और अपने अधिकारों का उपभोग करने का अवसर मिलना चाहिए।” सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि कई अपराधों के लिए समय-सीमा आधारित अयोग्यता होती है, जो सीमित अवधि के लिए लागू रहती है।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि वह संसद को यह निर्देश न दे कि उसे किस प्रकार का कानून बनाना चाहिए। सरकार का कहना था कि न्यायपालिका का कार्य केवल यह देखना है कि कोई कानून संविधान के अनुरूप है या नहीं, लेकिन वह संसद को यह नहीं बता सकती कि उसे कानून कैसे बनाना चाहिए।”