ट्रंप सरकार की 'टैरिफ तलवार' से भारत पर सबसे बड़ा प्रहार: श्रम आधारित सेक्टर बुरी तरह प्रभावित
US Tariffs: अमेरिका, जो भारतीय उत्पादों के लिए अब तक का सबसे बड़ा विदेशी बाजार रहा है, अब भारतीय उद्योगों के लिए चिंता का केंद्र बन चुका है। ‘ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव’ (GTRI) की नई रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि अमेरिकी आयात शुल्कों में भारी बढ़ोतरी ने भारतीय निर्यात की रीढ़ पर गंभीर असर डाला है। मई से अक्टूबर 2025 के बीच भारतीय निर्यात 28.5% लुढ़क गया, यह केवल संख्या का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के रोजगार, कारखानों की उत्पादन प्रक्रिया और देश के विदेशी व्यापार के लिए खतरे की घंटी है।
अमेरिका ने बढ़ाए टैरिफ
स्मार्टफोन और फार्मा सेक्टर भी नहीं बच पाए बाजार की गिरती धारणा
स्मार्टफोन, दवाइयों और पेट्रोलियम जैसे उत्पादों पर तकनीकी रूप से टैरिफ लागू नहीं है, लेकिन अमेरिकी बाजार की कमजोर होती मांग और बढ़ते अनिश्चित माहौल ने इन क्षेत्रों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। मई 2025 में जहां इन उत्पादों का निर्यात 3.42 अरब डॉलर था, वह अक्टूबर में घटकर 2.54 अरब डॉलर पर आ गया। GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, स्मार्टफोन निर्यात सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है, मई के 2.29 अरब डॉलर की तुलना में यह अक्टूबर में 1.50 अरब डॉलर रह गया।
श्रम आधारित उद्योगों पर सबसे बड़ा संकट
भारत के श्रम आधारित उद्योग रत्न-आभूषण, कपड़ा, परिधान, रसायन और सीफूड अमेरिकी टैरिफ का सबसे भारी भार झेल रहे हैं। इन सेक्टरों में करोड़ों लोग काम करते हैं और निर्यात में सीधे योगदान देते हैं। लेकिन 50% टैरिफ लागू होने के बाद इन सेक्टरों का निर्यात 4.78 अरब डॉलर से घटकर 3.29 अरब डॉलर रह गया। केवल पांच महीनों में 1.5 अरब डॉलर की पूंजी बाजार से गायब हो गई है। रसायन उद्योग ने 38% की गिरावट दर्ज की, जो इस क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
स्टील से लेकर ऑटो-पार्ट्स तक, वैश्विक मानकों वाले उत्पाद भी नहीं बच पाए
लोहा, इस्पात, एल्युमीनियम और ऑटो पार्ट्स जैसे उत्पाद, जो वैश्विक स्तर पर एक समान शुल्क व्यवस्था में आते हैं, उनका प्रदर्शन भी अमेरिकी टैरिफ के बाद कमजोर हुआ है। मई से अक्टूबर के बीच इन श्रेणियों में निर्यात 23.8% गिर गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ट्रंप प्रशासन की कठोर नीतियों में जल्द सुधार नहीं आता, तो भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में टिके रहना कठिन हो जाएगा। इसका सीधा असर देश के विनिर्माण, उत्पादन स्तर और रोजगार बाजार पर पड़ सकता है।
