Thursday, April 18, 2024

व्यंग्य: दो चित्र महंगाई के

मुज़फ्फर नगर लोकसभा सीट से आप किसे सांसद चुनना चाहते हैं |

इन दिनों वे महंगाई का रोना रो रहे हैं। रोता है आदमी जब समस्या ग्रस्त होता है, रोता ही रहता है। भले ही उसके पास कितना कुछ भी क्यों न हो, पर रोता है। रोना उसका स्वभाव है। रोने के पीछे कई अच्छे कारण भी हैं, जो रोने के बाद पता चलते हैं। आपके आंसू पोंछने के लिए राजनीति के घडिय़ालों के एक सिद्ध दिमाग की एक भीड़ होती है। जिनके हाथों में तथाकथित रुमाल होता है, जो आपके आंसू पोंछने के लिए होता है। आपके चेहरे पर सहानुभूति का स्पर्श देने के लिए कई हाथ एक साथ बढ़ जाते हैं। इसको लेकर राजनीति में बहस छिड़ जाती है। मीडिया में ब्रेकिंग न्यूज़, एक्सक्लूसिव रिपोर्ट आने लगाती हैं। फलां चैनल ने फलां दल के फलां राष्ट्रीय नेता के आंसू पोछने का प्रसारण किया। संसद, विधानसभा में आंसू को लेकर बहिर्गमन, उठापटक , तोडफ़ोड़, शुरू हो जाते हैं।

प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया। सरकार के तरफ से मुआवजा, पीडि़त से मुलाक़ात करने के साथ हर संभव सहायता का एैलान। शर्मा जी तो यूँ ही रो रहे हैं महंगाई के नाम पर रोना पड़ता है। अपने पीछे एक भीड़ की सहानुभूति के लिए। लोगों के साथ हाँ में हां मिलाने के लिए कि महंगाई बढ़ी है। कमरतोड़ महंगाई। समाज में ऐसे घडियालों की बड़ी मांग है साब। मन ही मन व अपनों के बीच कभी-कभी वे कहते हैं- काहे की महंगाई यार। महंगाई तो तब भी थी, आज भी है। कल भी रहेगी। तो क्या महंगाई का रोना रो कर खाना-पीना छोड़ दें। ऐशोआराम से खुद को वंचित रखें।

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राजनीति महंगाई को लेकर सत्ता चला रही है। मीडिया महंगाई की खबरों पर जी रहा है। आम आदमी भीड़ का हिस्सा बन रहा है महंगाई के बैनर तले। किसी ने कहा उनसे यार, तुम्हारी पगार भी तो बढ़ी है महंगाई के साथ। वे नाराज हो गए। बोले- तुम लोगों की नजर तो बस हमारी पगार पर होती है। बचत नहीं है साब। कई बार तो उलटे कर्जे पर आ जाते हैं। खर्च कम करो काहे छलांग मारते हो। वे चिढ़ गए। वर्मा जी भी शहर में नौकरी करते हैं। वे शुद्ध महंगाई का रोना रोते रहते हैं। कभी पत्नी-बच्चों से तो कभी पड़ोसी, रिश्तेदार, मित्रों से। आपने चाय पीना छोड़ दिया, महंगाई है तो बादाम खाना भूल गए , महंगाई है।

कभी तो वे किसानों की आत्महत्या से खुद को जोड़कर कह उठते हैं- क्या करे आम इंसान आत्महत्या न करे तो क्या करे। वर्मा जी महंगाई का रोना रो रहे हैं। शहर में रहना महंगाई से हाथापाई करना ही है। ऐसा वे कहते हैं। यार इससे अच्छा तो हमारा गाँव है- जहां अनावश्यक खर्चे नहीं हैं। इसलिए हमने प्लान सेट किया है, क्यों न फैमिली को गांव में शिफ्ट कर दिया जाए। खर्चे में कमी आएगी। अपना क्या है पड़े रहेंगे एक कमरा किराए पर लेकर। सस्ता सा। रुपया-पैसा बचाने का यह उपाय उनके मन में है। वे पत्नी बच्चों को समझा रहे हैं। पत्नी-बच्चे नाखुश हैं। क्यों न हों नाखुश, शहर की आवोहवा में काफी वक्त गुजारा है।

अब गाँव की तरफ रुख। वे समझा रहे- गाँव की आबोहवा शुद्ध होती है। लोग कम बीमार पड़ते हैं। फालतू खर्च कम होने से बचत ही बचत होती है। पत्नी ने बच्चों की पढ़ाई को लेकर चिन्ता व्यक्त की तो उन्होंने इस पर भी तर्क दे डाले। ‘देखो भाई , तुम अभी नासमझ हो। जऱा बोर्ड एग्जाम की मेरिट सूची उठाकर देखो। ज्यादातर बच्चे गाँव के स्कूलों के छाये हैं। गाँव को गाँव मत कहो। पढ़ाई वहां भी होती है। दिखावेबाजी से दूर रहकर। नाना प्रकार के तर्क दे डाले। अंतत: पति के चलते तर्क के आगे पत्नी को हारना ही पड़ता है। वह भी हार गयी। बच्चों सहित गाँव में शिफ्ट हो गयी। वे अकेले रह गए शहर में। महंगाई जो है।

समझौता करना पड़ता है वक्त से खर्च कम करना मुश्किल था शहर में। महँगा स्तर समायोजन। कितना मुश्किल काम है। अब वे अकेले हैं सो स्तर मेंटेन की बात ज्यादा परेशान नहीं करती। घट- बढ़ चलता है। ‘ यार, अकेले हैं , नौकरी रहते ज्यादा वक्त नहीं मिलता। कहाँ- कहाँ देखें। कितनी सारी समस्याएं होती हैं अकेले आदमी के साथ। न खाने का ठिकाना, न पीने का और न सोने का। अब वे खुश हैं पर अनावश्यक स्टेंडर्ड मेंटेन के झमेले से। महंगाई को लतियाने की तैयारी के साथ। कभी वे यार-दोस्तों के यहाँ खा-पी लेते हैं तो कभी सुबह के बचे खाने से शाम का भी काम चला लेते हैं या फिर पहुँच जाते हैं यार-दोस्तों के यहाँ खाना खाने के वक्त। बचत का यह उनका अपना फंडा है। अब वे महंगाई का रोना रोने की बजाय अन्दर से खुश हैं।

इस ख़ुशी को ढांपने के लिए वे रोने-धोने का नकाब आज भी लगाए बैठे हैं। आम आदमी की तरह महंगाई की विरोधी रैली का हिस्सा बन जाते हैं कभी-कभी। ताकि महंगाई की पीड़ा का चेहरे पर चढ़ा नकाब झलकता रहे आम आदमी के बीच।
सुनील कुमार ‘सजल – विभूति फीचर्स

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