शंकराचार्य के साथ घटना पर संत हुए दो-फाड़, रामदेव बोले- संतों के साथ अपमानजनक व्यवहार अस्वीकार्य , अनिरुद्धाचार्य बोले- बहुत गलत हुआ !
प्रयागराज। माघ मेले के पावन संगम तट पर मौनी अमावस्या स्नान के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और पुलिस प्रशासन के बीच हुई भिड़ंत ने अब एक बड़ा रूप ले लिया है। इस घटनाक्रम पर देश के दिग्गज संतों ने अपनी राय रखी है, जिससे पूरा संत समाज दो धड़ों में बँटा नजर आ रहा है।
समर्थन में उतरे संत: "शिखा और संत का अपमान निंदनीय"
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बाबा रामदेव: संगम स्नान के बाद उन्होंने कहा कि पूजनीय संतों के साथ अपमानजनक व्यवहार किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ माघ मेले में हुई बदसलूकी पर उन्होंने कहा, "यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे अपने योगियों और पूजनीय संतों को भी अपमानजनक या अपशब्दों का सामना करना पड़ता है।
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शंकराचार्य सदानंद सरस्वती (द्वारका शारदा पीठ): उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि पुलिस ने जिन ब्राह्मणों की शिखा पकड़ी, उसमें ब्रह्मा का वास होता है। गंगा स्नान से रोकना 'गोहत्या' के समान पाप है।
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शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती (पुरी): उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद को अपना 'लाडला' बताया और कहा कि उनके निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय तक मान्यता देता है।
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कथावाचक अनिरुद्धाचार्य: उन्होंने सीधा हमला बोलते हुए कहा कि प्रशासन अपनी 'अकड़' छोड़े और संतों से माफी मांगे। चोटी पकड़कर मारना संवैधानिक अधिकार नहीं है।
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देवकीनंदन ठाकुर (आगरा): उन्होंने इसे धर्मसंकट बताया लेकिन स्पष्ट किया कि तिलक, शिखा और भगवा का अपमान प्रशासन को शोभा नहीं देता।
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महंत रामदास (मथुरा): उन्होंने कहा कि शंकराचार्य का पद महादेव का पद है, बटुक ब्राह्मणों का अपमान सनातन का अपमान है।
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स्वामी चक्रपाणि महाराज: उन्होंने चोटी खींचने की घटना को 'जघन्य अपराध' बताते हुए ईश्वरीय दंड की चेतावनी दी।
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आचार्य पंडित राकेश दास (अयोध्या): उन्होंने पालकी विवाद पर स्वामी जी का पक्ष लेते हुए कहा कि उन्हें रोकना किसी भी रूप में उचित नहीं था।
विरोध में आए संत: "राजनीति और मर्यादा का हवाला"
वहीं, कुछ संतों ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के आचरण और उनके पद पर ही सवाल खड़े किए हैं:
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महंत रविंद्र पुरी (अध्यक्ष, अखाड़ा परिषद): उन्होंने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपशब्द कहने वाला व्यक्ति संत नहीं हो सकता।
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स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती (संत समिति): उन्होंने कानूनी दस्तावेज पेश करते हुए दावा किया कि कोर्ट के आदेशानुसार अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती।
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जगद्गुरु रामानुजाचार्य शांडिल्य: उन्होंने कहा कि संतों के बीच राजनीति नहीं होनी चाहिए और प्रशासन को केवल माफी मांगकर मामला खत्म करना चाहिए।
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महंत अतुल कृष्ण महाराज (वृंदावन): उन्होंने स्वामी जी के अनशन को अनुचित बताया और कहा कि इस खींचतान को मुख्यमंत्री को तुरंत खत्म करना चाहिए।
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हनुमानगढ़ी के पुजारी (तुलसीदास और शत्रुघ्न दास): इन्होंने आरोप लगाया कि यह कांग्रेस के इशारे पर सरकार के खिलाफ एक साजिश है।
प्रशासन की कार्रवाई और नोटिस
मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी कर सदैव के लिए मेले में प्रवेश प्रतिबंधित करने की चेतावनी दी है। प्रशासन का आरोप है कि उन्होंने पुल संख्या दो पर बैरियर तोड़ा, जबकि स्वामी पक्ष का कहना है कि प्रशासन दुर्भावनापूर्ण तरीके से काम कर रहा है।
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लेखक के बारे में
कुलदीप सिंह वर्ष 2003 से निरंतर रॉयल बुलेटिन संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं। पिछले दो दशकों से अधिक समय से वह संस्थान की प्रगति में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
वर्तमान में वह कंप्यूटर विभाग में वरिष्ठ भूमिका निभाने के साथ-साथ संपादकीय टीम के एक प्रमुख स्तंभ हैं। तकनीकी कार्यप्रणाली पर गहरी पकड़ और संपादकीय समझ के समन्वय के साथ कुलदीप सिंह समाचार पत्र और डिजिटल पोर्टल की गुणवत्ता को निरंतर नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं।
