Tuesday, April 1, 2025

जीवन में जो दे नहीं सकते उसे लेने का क्या हक़ ?

कभी-कभी जीवन में ऐसी घटना अथवा प्रसंग आ जाते हैं कि जीवन की धारा ही बदल जाती है। ऐसे अनेक प्रसंग हमारे सम्मुख हैं। रत्नाकर डाकू था, किन्तु वह ऋषि बाल्मिकी बन गया। पत्नी मोह में डूबे तुलसीदास संत कवि तुलसीदास बनकर अमर हो गये।

अनपढ गंवार कालीदास संस्कृत का महान कवि बन गया। मानव हत्यारे अंगुलीमाल के सामने जब महात्मा बुद्ध आये तो उसने कहा कि मैं लोगों की उंगलियां काटकर प्रतिदिन माला बनाता हूं, यह मेरी प्रतिज्ञा है। आपकी उंगलियों को काटकर मैं अपनी माला पूरी करूंगा। महात्मा बुद्ध बोले कि भाई मुझे मारना ही है तो मेरी अंतिम इच्छा पूरी करो। अंगुलीमाल के पूछने पर महात्मा बुद्ध ने कहा कि इस पेड़ का एक पत्ता तोड़कर मुझे दे दो। उसने पूरी डाली को ही तोड़कर बुद्ध के हाथ में थमा दी। बुद्ध ने कहा कि मुझे इतने पत्ते नहीं चाहिए, तुम इस डाली को वापिस पेड़ से जोड़ दो।

अंगुलीमाल कहता है कि यह डाली कैसे पेड़ से जुड़ेगी। यह तो असम्भव है, यह तो टूट चुकी है। इस पर गौतम बुद्ध बोले कि जब तुम इसे वापिस पेड़ पर जोड़ नहीं सकते, तो तोडऩे का अधिकार भी तुम्हें नहीं है। इस बात ने अंगुलीमाल का हृदय परिवर्तन कर दिया और वह महात्मा बुद्ध के  शरणागत हो गया। इसलिए अपने स्वार्थ के लिए जीव हत्या करने वालों जब तुममें मृत में प्राण फूंकने की क्षमता नहीं है, तो हत्या करने का अधिकार भी तुम्हें नहीं है।

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