हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पति को कंगाल बनाने वाली पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता..!
प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि अगर कोई पत्नी अपने कामों या गलतियों से अपने पति की कमाने की क्षमता को खत्म करती है या उसमें योगदान देती है तो उसे ऐसी स्थिति का फायदा उठाने और मेंटेनेंस का दावा करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ऐसे मामले में मेंटेनेंस देना "गंभीर अन्याय" होगा। खासकर जब पति की कमाने की क्षमता पत्नी के परिवार के आपराधिक कामों से खत्म हो गई हो।
जब पति ने विरोध किया तो पत्नी के भाई ने गोली चला दी। इस हमले में पति को गंभीर गोली लगी, जिससे एक छर्रा पति की रीढ़ की हड्डी में फंस गया। रिकॉर्ड पर मौजूद मेडिकल सलाह से पता चला कि छर्रे को निकालने के लिए किसी भी सर्जरी में लकवा होने का बहुत ज़्यादा खतरा है। नतीजतन, पति अब थोड़े समय के लिए भी आराम से बैठ नहीं पाता। इस वजह से वह बेरोजगार हो गया और कोई इनकम नहीं कमा पा रहा है। हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता-पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि उसके अंतरिम मेंटेनेंस की अर्जी को खारिज करने वाला आदेश गैर-कानूनी और मनमाना था, क्योंकि पति पत्नी को मेंटेनेंस देने के लिए बाध्य है। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में, पति की मेडिकल कंडीशन के बारे में कोर्ट के तथ्यात्मक निष्कर्षों पर कोई विवाद नहीं था। न्यायालय ने कहा कि हालांकि पत्नी का भरण-पोषण करना पति का पवित्र कर्तव्य है, लेकिन इस मामले के तथ्यों में, पत्नी और उसके परिवार के सदस्यों के व्यवहार ने पति को अपनी आजीविका कमाने में असमर्थ बना दिया था।
इस संबंध में कोर्ट ने शमीमा फारूकी बनाम शाहिद खान मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि भरण-पोषण करने की पति की ज़िम्मेदारी उसकी कमाने की क्षमता पर निर्भर करती है। हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि पति की शारीरिक अक्षमता, खासकर उसकी रीढ़ की हड्डी में गोली लगने से लकवा होने का खतरा, याचिकाकर्ता पक्ष के कारण हुआ था, इसलिए उसे भरण-पोषण न देने के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इस प्रकार, हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत के आदेश में कोई बड़ी अनियमितता या स्पष्ट अवैधता नहीं की थी। कोर्ट ने रिवीजन याचिका खारिज कर दी।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।
