जीव और परमात्मा का अंतर्निहित संबंध
जीव आत्मा परमात्मा का अंश है। जन्म और जन्मान्तरों के चक्र में यह अंश हमेशा उस स्रोत — परमात्मा — से मिलने के लिए तड़पता रहता है। सम्पूर्ण ब्रह्मांड में पूर्ण केवल परमात्मा है; संसार में जो भी भोग और सुख के साधन जीव को प्राप्त होते हैं, वे सभी अपूर्ण हैं। इसलिए केवल सांसारिक सुखों से जीव को पूर्ण आनन्द कभी नहीं मिल सकता।
उदाहरण के रूप में:
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पानी से बिछुड़ी मछली चाहे कितने भी मिठास वाले पदार्थों में रख दी जाए, वह तड़पती रहती है; केवल पानी में ही उसे शान्ति मिलती है।
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पति से बिछड़ी पत्नी को संसार के सभी सुख और सम्मान दे दिए जाएँ, फिर भी उसका मन दुखी ही रहेगा।
इसी प्रकार, परमात्मा से बिछड़ी आत्मा को जितने भी सांसारिक सुख और ऐश्वर्य मिल जाएँ, वह हमेशा अधूरा और दुखी ही रहता है। चूंकि आत्मा का मूल परमात्मा है, जब तक उसका मिलन परमात्मा से नहीं होगा, उसकी भटकन और तड़पन समाप्त नहीं होगी।
यह उपदेश हमें याद दिलाता है कि असली संतोष और स्थायी आनन्द केवल आध्यात्मिक मिलन और आत्मा के परमात्मा से जुड़ने में ही संभव है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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