नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने देश में फिर से उभर रहे मंदिर-मस्जिद विवादों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के बाद कुछ लोग ऐसे मुद्दों को उठाकर “हिंदुओं के नेता” बनने की कोशिश कर रहे हैं, जो स्वीकार्य नहीं है।
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गुरुवार को “भारत-विश्वगुरु” विषय पर सहजीवन व्याख्यानमाला में बोलते हुए भागवत ने भारतीय समाज की बहुलता और समावेशी सोच पर जोर दिया। उन्होंने रामकृष्ण मिशन में क्रिसमस मनाए जाने का उदाहरण देते हुए कहा कि “हम लंबे समय से सद्भावना से रह रहे हैं। यह हमारी परंपरा है।”
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भागवत ने स्पष्ट किया कि राम मंदिर का निर्माण सभी हिंदुओं की आस्था का विषय था। लेकिन उन्होंने आगाह किया कि हर दिन नए विवाद उठाना उचित नहीं है। उन्होंने कहा, “भारत को यह दिखाने की जरूरत है कि हम सभी मिल-जुलकर रह सकते हैं।”
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि इतिहास में कुछ बाहरी समूह अपने साथ कट्टरता लेकर आए, लेकिन अब देश संविधान के अनुसार चलता है। उन्होंने मुगल बादशाह औरंगजेब के शासन की कट्टरता का जिक्र करते हुए कहा कि उसके वंशज बहादुर शाह जफर ने 1857 में गोहत्या पर प्रतिबंध लगाकर अलग दृष्टिकोण पेश किया था।
भागवत ने कहा कि सभी भारतीय समान हैं, और “वर्चस्व की भाषा” का उपयोग करना गलत है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सभी को अपनी-अपनी पूजा पद्धतियों का पालन करने की स्वतंत्रता है।