बेटियों के संपत्ति अधिकार : उत्तराधिकार कानूनों का विरोधाभास और समानता की कानूनी जंग
लखनऊ । उत्तर प्रदेश सरकार की रिसर्च एवं डेवलपमेंट योजना 2021-22 के अंतर्गत लखनऊ विश्वविद्यालय के विधि संकाय द्वारा किए गए एक महत्वपूर्ण अध्ययन ने बेटियों के उत्तराधिकार अधिकारों की वास्तविक स्थिति को सामने ला दिया है। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि कृषि भूमि और पैतृक संपत्ति में बेटियों को बराबरी का अधिकार दिलाने की बात तो की जाती है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर आज भी उन्हें संपत्ति से वंचित किया जा रहा है। यह शोध परियोजना “मिशन शक्ति के अंतर्गत बेटियों के कृषि एवं पैतृक सम्पत्ति में उत्तराधिकार की स्थिति का विधिक मूल्यांकन” विषय पर तैयार की गई।
परियोजना के प्रधान अन्वेषक प्रो. राकेश कुमार सिंह ने बताया कि उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि के उत्तराधिकार की प्रक्रिया उत्तर प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 2006 के तहत संचालित होती है। इस कानून में केवल अविवाहित पुत्री को ही पिता की कृषि भूमि में हिस्सेदारी का अधिकार दिया गया है, जबकि विवाहिता पुत्री का अधिकार स्वतः समाप्त मान लिया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रावधान बेटियों को शादी और संपत्ति के बीच कठिन निर्णय लेने को मजबूर करता है और समान अधिकार की अवधारणा के विपरीत है। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि इसके विपरीत हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 बेटियों को जन्म से ही पैतृक संपत्ति में समान अधिकार देता है। इतना ही नहीं, सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा भी बेटियों के बराबरी के अधिकार को पूरी मजबूती से स्थापित करता है। ऐसे में राज्य के भू-राजस्व कानून और केंद्र के उत्तराधिकार कानून में मौजूद यह विरोधाभास अनेक स्तरों पर विवादों और असमानता को जन्म देता है।
रिपोर्ट में लखनऊ जनपद की बक्शी का तालाब तहसील में कराए गए सर्वे का उल्लेख भी किया गया है। सर्वे के निष्कर्ष बेहद चौंकाने वाले रहे। इसके मुताबिक लगभग 90 प्रतिशत बेटियों को पिता की संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया गया। इसके साथ ही बड़ी संख्या में बेटियां अपने अधिकारों और कानूनी प्रावधानों से भी अनजान पाई गईं। रिपोर्ट ने सरकार को कई ठोस सुझाव दिए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि विवाहिता पुत्री की वास्तविक हिस्सेदारी विवाह के समय ही तय कर दी जानी चाहिए, ताकि आगे विवाद की स्थिति न बने। साथ ही यह भी सिफारिश की गई है कि पति के परिवार में भी महिला को पति के बराबर अधिकार सुनिश्चित किए जाएं। बेटियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाने तथा पारिवारिक संपत्ति विवादों के त्वरित निस्तारण के लिये अलग विशेष न्यायालय गठित करने का सुझाव भी दिया गया है।
रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा गया है कि सामाजिक दबाव, गलत धारणाएं और वसीयत जैसी प्रक्रियाओं के जरिए बेटियों को संपत्ति से वंचित किया जा रहा है। ऐसे में सरकार से अपेक्षा जताई गई है कि कानूनों में आवश्यक संशोधन कर बेटियों को उत्तराधिकार में वास्तविक न्याय और समान अधिकार सुनिश्चित किया जाए।
