राजधानी की 'अदृश्य' असुरक्षा: 15 दिन में 807 लापता, हर घंटे दो लोग हो रहे गायब

लापता होने वालों में 509 महिलाएं और 191 मासूम शामिल, सुरक्षा के आधुनिक दावों के बीच 'मानव तस्करी' और 'प्रशासनिक उदासीनता' का बड़ा संकट

देश की राजधानी दिल्ली को अक्सर सत्ता, सुरक्षा और आधुनिकता का प्रतीक बताया जाता है। ऊँची इमारतें, स्मार्ट सिटी के दावे, चौबीसों घंटे निगरानी के कैमरे और दुनिया की सबसे बड़ी पुलिस व्यवस्थाओं में से एक—ये सब मिलकर यह भरोसा दिलाते हैं कि दिल्ली सुरक्षित है। लेकिन वर्ष 2026 के पहले पंद्रह दिनों के आँकड़े इस भरोसे को गहरे संदेह में बदल देते हैं। दिल्ली पुलिस के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, केवल 1 से 15 जनवरी के बीच 807 लोग लापता हुए। औसतन हर दिन 54 लोग, यानी हर घंटे दो से अधिक लोग, इस शहर में ग़ायब हो गए। यह कोई साधारण अपराध आँकड़ा नहीं है जिसे रोज़मर्रा की रिपोर्टिंग का हिस्सा मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाए।

 
इस पूरी तस्वीर का सबसे भयावह पहलू यह है कि लापता लोगों में से 509 महिलाएँ और लड़कियाँ हैं। यानी लगभग दो-तिहाई मामले सीधे तौर पर महिला सुरक्षा से जुड़े हैं। जिस राजधानी में महिला सुरक्षा को लेकर सबसे ज़्यादा दावे किए जाते हैं, वहीं इतने बड़े पैमाने पर महिलाओं और लड़कियों का लापता होना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह केवल अपराध का नहीं, बल्कि असुरक्षा के सामान्यीकरण का संकेत है, जहाँ महिलाओं का ग़ायब हो जाना भी एक आँकड़े में बदल जाता है।
 
इन 807 लापता मामलों में 191 नाबालिग शामिल हैं। इनमें से 146 नाबालिग लड़कियाँ हैं। इसका अर्थ यह है कि केवल पंद्रह दिनों में हर दिन औसतन 13 बच्चे लापता हुए, और उनमें बहुसंख्यक लड़कियाँ थीं। यह तथ्य किसी भी संवेदनशील समाज के लिए चेतावनी की घंटी होना चाहिए। लेकिन हमारी सामाजिक प्रतिक्रिया अक्सर उतनी तीव्र नहीं होती, जितनी होनी चाहिए। आँकड़े पढ़े जाते हैं, बहस होती है, और फिर अगली खबर आ जाती है।
 
दिल्ली पुलिस के अनुसार 235 लोगों को ढूँढ लिया गया है, लेकिन 572 लोग अब भी लापता हैं। यह संख्या केवल एक प्रशासनिक प्रगति रिपोर्ट नहीं है। यह 572 परिवारों की अनिश्चितता, पीड़ा और अंतहीन प्रतीक्षा का प्रतीक है। हर बीतता दिन उन लोगों के लिए उम्मीद को थोड़ा और कम कर देता है, जिनके अपने अचानक ग़ायब हो गए। सवाल यह नहीं है कि कुछ लोग मिल गए, सवाल यह है कि इतनी बड़ी संख्या में लोग अब भी क्यों नहीं मिले।
 
एक असहज लेकिन ज़रूरी सवाल यह भी है कि क्या हर लापता व्यक्ति के मामले को समान गंभीरता से लिया जाता है। व्यवहारिक सच्चाई यह है कि ग़रीब, प्रवासी मज़दूर, घरेलू कामगार, या झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोगों की गुमशुदगी को अक्सर हल्के में लिया जाता है। कई मामलों में शुरुआती प्रतिक्रिया ही संदेह से भरी होती है—“घर से भाग गया होगा”, “किसी रिश्तेदार के पास चला गया होगा।” खासकर लड़कियों के मामलों में यह मानसिकता और भी खतरनाक साबित होती है, क्योंकि शुरुआती घंटों की लापरवाही बाद में अपूरणीय नुकसान में बदल जाती है।
 
महिलाओं और बच्चों के लापता होने के पीछे केवल व्यक्तिगत कारण नहीं होते। इसके पीछे मानव तस्करी, संगठित अपराध, अवैध श्रम, यौन शोषण, घरेलू हिंसा और जबरन विवाह जैसे कई भयावह पहलू जुड़े होते हैं। दिल्ली जैसे महानगर इन नेटवर्कों के लिए केवल गंतव्य नहीं, बल्कि ट्रांजिट पॉइंट भी हैं। ऐसे में यह बेहद ज़रूरी हो जाता है कि हर लापता मामले को केवल “Missing Person” कहकर दर्ज न किया जाए, बल्कि संभावित अपराध की दृष्टि से उसकी गंभीर जाँच हो।
 
यह और भी चिंताजनक हो जाता है जब हम यह देखते हैं कि यह सब कुछ तकनीक के युग में हो रहा है। आज मोबाइल फोन, लोकेशन डेटा, सीसीटीवी कैमरे, डिजिटल भुगतान और सोशल मीडिया जैसी तकनीकों के बावजूद अगर इतने बड़े पैमाने पर लोग लापता हो रहे हैं, तो यह या तो संसाधनों के सही इस्तेमाल की कमी को दर्शाता है या इच्छाशक्ति की कमी को। जब किसी वीआईपी मूवमेंट के लिए पूरा शहर कुछ ही मिनटों में ठप किया जा सकता है, तो आम नागरिक के लापता होने पर वही तत्परता क्यों नहीं दिखाई देती?
 
यह समस्या केवल पुलिस या सरकार तक सीमित नहीं है। समाज की भूमिका और हमारी सामूहिक चुप्पी भी उतनी ही ज़िम्मेदार है। हम खबर पढ़ते हैं, कुछ देर के लिए चिंतित होते हैं, फिर अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लौट जाते हैं। जब तक कोई लापता व्यक्ति हमारे परिवार, मोहल्ले या पहचान के दायरे में नहीं आता, तब तक वह हमारे लिए एक दूर की खबर ही बना रहता है। यही उदासीनता इस समस्या को और गहरा करती है।
 
हर सरकार महिला सुरक्षा को अपनी प्राथमिकता बताती है। हेल्पलाइन नंबर, मोबाइल ऐप्स, जागरूकता अभियान और फास्ट ट्रैक कोर्ट की घोषणाएँ होती हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत बार-बार इन दावों को झुठलाती है। अगर नीतियाँ वास्तव में प्रभावी होतीं, तो देश की राजधानी में पंद्रह दिनों के भीतर 509 महिलाएँ और लड़कियाँ लापता नहीं होतीं। यह अंतर नीति और व्यवहार के बीच की खाई को उजागर करता है।
 
यह समय आत्ममंथन का है। यह पूछने का समय है कि क्या हमारी नीतियाँ सिर्फ़ काग़ज़ों तक सीमित रह गई हैं। क्या हर लापता मामले की समयबद्ध समीक्षा होती है। क्या लापरवाही पर जवाबदेही तय की जाती है। अक्सर इन सवालों के जवाब मौन में खो जाते हैं, और यही मौन समस्या को और गंभीर बना देता है।
 
इस संकट का समाधान किसी एक विभाग या एक आदेश से नहीं हो सकता। इसके लिए समन्वित प्रयास की ज़रूरत है—पुलिस की संवेदनशीलता, प्रशासन की सक्रियता, समाज की जागरूकता और राजनीतिक इच्छाशक्ति, सभी को एक साथ आना होगा। महिलाओं और बच्चों के लापता मामलों को आपात स्थिति की तरह लिया जाना चाहिए, न कि रूटीन प्रक्रिया की तरह।
 
अंततः सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि दिल्ली कितनी आधुनिक या कितनी स्मार्ट है। असली सवाल यह है कि क्या यह शहर अपने सबसे कमज़ोर नागरिकों को सुरक्षित रख पा रहा है। अगर जवाब नकारात्मक है, तो यह केवल प्रशासन की नहीं, हमारी सामूहिक विफलता है। लापता लोग सिर्फ़ आँकड़ों में दर्ज नाम नहीं हैं। वे हमारी सामाजिक चेतना की परीक्षा हैं—और फिलहाल, इस परीक्षा में हम असफल होते दिखाई दे रहे हैं।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)

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