व्यंग्य- भेदभाव का पहला परिचय प्रपत्र
प्राथमिक विद्यालय से लेकर उच्च शिक्षा संस्थान तक जितने भी प्रवेश फार्म भरे गए , सभी में कॉलम लगभग समान थे -
नाम / पिता का नाम / पता / अभिभावक का नाम/ धर्म / जाति / वर्ग ( सामान्य , अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति/ अन्य पिछड़ा वर्ग )
प्रारंभ में यह समझ नहीं आया, कि जाति के कॉलम में जाति लिखना अनिवार्य है या नहीं। फिर भी सभी कॉलम में लिखा करते थे - अमुक धर्म, अमुक जाति,अमुक वर्ग।
इसका सही उद्देश्य बाद में समझ आया, कि जब प्रवेश फार्म के आधार पर प्रवेश प्रक्रिया में सुपात्र प्रवेशार्थियों की सूची बनाने में जाति की भूमिका स्पष्ट हुई। पचास प्रतिशत मिश्रित सूची, जिसमें जातीय आधार की कोई भूमिका नहीं थी। हर जाति, हर वर्ग सामान्य सूची में दावेदार था। उसके उपरांत अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति/जनजाति के अभ्यर्थियों के फार्म वर्ग के अनुसार अलग किये जाते थे। सामान्य वर्ग के फार्म एक ओर रख दिए जाते थे।
बहरहाल प्रवेश सूची बनाने वाली समिति विघटनकारी प्रयोगशाला में जाति, धर्म के नाम पर बंटवारा किया करती थी। उसके उपरांत प्रवेश सूची जारी की जाती थी, जिसमें स्पष्ट लिखा होता था। प्रवेश सूची सामान्य वर्ग , प्रवेश सूची - अन्य पिछड़ा वर्ग , प्रवेश सूची अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति, एक अरसे बाद इस सूची में दुर्बल आय वर्ग को जोड़ दिया गया।
इसके उपरांत प्रवेश प्रक्रिया प्रारंभ होती है। जातीय आधार पर प्रवेश के लिए फीस का ढांचा भी अलग।सामान्य व पिछड़ा वर्ग के लिए अलग, अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए अलग।
उसके उपरांत छात्रवृत्ति का खेल प्रारंभ होता है। बैंक में खाते खोले जाते हैं। कुछ तो प्रवेश ही छात्रवृत्ति लेने के लिए लेते हैं। विद्यालय में कक्षा से उन्हें कोई सरोकार नहीं होता। केवल तीन बार विद्यालय में उनके दर्शन होते हैं, प्रथम बार प्रवेश लेने के लिए, दूसरी बार छात्रवृत्ति के फ़ार्म भरने के लिए, तीसरी बार परीक्षा देने के लिए, उसकी भी कोई गारंटी नहीं होती, कि परीक्षा देंगे भी या नहीं। यदि संयोग से परीक्षा दे भी दी तथा उनके कम अंक आए, तो सीधा आरोप लगाते हैं, अध्यापक उनसे वैमनस्य रखता है, प्रेक्टिकल और वायवा में उन्हें प्रथम श्रेणी के अंक नहीं दिए गए। यह अध्यापक का जातिगत पूर्वाग्रह है।
बहरहाल जो भी हो, समाज को बांटने में प्रवेश फार्म में जातीय कॉलम का मुख्य स्थान होता है। यदि जातीय कॉलम और जाति आधारित छात्रवृत्ति का लुभावना लालच न हो, तो जातीय कॉलम की पूर्ति अनिवार्य भी नहीं होती, फिर भी सब चलता है। जातीय कॉलम ही है, जो भेदभाव की प्रयोगशाला के आंकड़े जारी करता है। इन आँकड़ों के आधार पर भविष्य में भेदभाव का आधार तैयार करता है। जातीय नेताओं को नेतागिरी करने का आधार प्रदान करता है। उन प्रावधानों को लागू करने के लिए राजनीति का हथियार बनता है, कि किसी को भी फर्जी और झूठी शिकायत करके उत्पीडित करो तथा भयमुक्त होकर झूठी शिकायतें करके समाज में भेदभाव बढ़ाते रहो, क्योंकि झूठी शिकायतों पर दण्ड का कोई प्रावधान नहीं होता।
यही प्रयोगशाला का परीक्षण निष्कर्ष है, जिसके आधार पर सियासत फलती है, फूलती है, अपने मतानुसार कार्य करने की छूट प्रदान करती है, जिसमें केवल भीड़ का समर्थन एवं विरोध सर्वोपरि होता है। तर्क और न्याय का कोई स्थान नहीं होता। *(विनायक फीचर्स)*
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