घर में बनी शाकाहारी थाली की कीमत में फरवरी में नहीं हुआ बदलाव, मांसाहारी थाली 3 प्रतिशत सस्ती
नई दिल्ली। क्रिसिल इंटेलिजेंस की शुक्रवार को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी में घर पर पकाई गई शाकाहारी थाली की कीमत में सालाना आधार पर कोई बदलाव नहीं हुआ, जबकि मांसाहारी थाली की कीमत में 3 प्रतिशत की गिरावट आई। रिपोर्ट में बताया गया कि फरवरी में आलू, प्याज और दालों की कीमत में कमी आने के बावजूद भी शाकाहारी थाली की कीमत यथावत रहने की वजह टमाटर की कीमत बढ़ना है। अधिक आवक के कारण प्याज की कीमतों में पिछले वर्ष की तुलना में 24 प्रतिशत की गिरावट आई।
ये भी पढ़ें शाहजहांपुर: खौफनाक वारदात में पत्नी की मौत, प्रेमी गंभीर; गुस्साए लोगों ने आरोपी पति को पीटाआलू की कीमतों में पिछले वर्ष की तुलना में 13 प्रतिशत की गिरावट आई, क्योंकि फसल कटाई के चरम पर पहुंच चुकी है और पिछले रबी सीजन के कोल्ड स्टोरेज स्टॉक की बिक्री जारी है। चालू वित्त वर्ष में अधिक ओपनिंग स्टॉक के कारण दालों की कीमतों में पिछले वर्ष की तुलना में 9 प्रतिशत की गिरावट आई। रिपोर्ट में बताया गया कि घर पर थाली बनाने की औसत लागत की गणना उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम भारत में प्रचलित कच्चे माल की कीमतों के आधार पर की जाती है। मासिक बदलाव आम आदमी के खर्च पर पड़ने वाले प्रभाव को दर्शाता है। मांसाहारी थाली की कीमत में गिरावट आई है, जिसका मुख्य कारण ब्रॉयलर की कीमतों में वार्षिक आधार पर अनुमानित 7 प्रतिशत की कमी है। ब्रॉयलर की कीमतें कुल मांसाहारी थाली की लागत का 50 प्रतिशत होती है। क्रिसिल इंटेलिजेंस के निदेशक पुष्पन शर्मा ने कहा, “टमाटर की कीमतों में उछाल का कारण रोपाई में देरी है, जिससे फसल के विकास और पैदावार पर असर पड़ा।
नवंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच मंडियों में फसल की आवक में वार्षिक आधार पर 32 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।” निकट भविष्य में सब्जियों की कीमतों में नरमी आने की उम्मीद है। टमाटर की कीमतें अप्रैल के मध्य तक पिछले वर्ष की तुलना में अधिक रहने की संभावना है और फिर मौसमी आवक बढ़ने और बाजार में फसल चक्रों के बदलाव के साथ इनमें मजबूती आएगी। शर्मा ने कहा, "आलू की कीमतें मार्च-अप्रैल के दौरान, यानी आवक के चरम मौसम में, कम रहने की संभावना है, जबकि प्याज की कीमतों पर अगले दो से तीन महीनों में दबाव पड़ सकता है, जब तक कि निर्यात में मजबूत वृद्धि न हो।" मध्य पूर्व में व्याप्त अनिश्चितताओं और संभावित व्यापारिक बाधाओं के कारण निकट भविष्य में बासमती चावल की मांग में नरमी आ सकती है, जिससे कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। भारत के बासमती चावल निर्यात में ईरान का हिस्सा लगभग 18 प्रतिशत है और अन्य मध्य पूर्वी देशों का 55-60 प्रतिशत हिस्सा है, इसलिए निर्यातक संभावित रसद संबंधी चुनौतियों को लेकर सतर्क हैं। शर्मा ने कहा, "हालांकि, गैर-बासमती चावल निर्यात, जो मुख्य रूप से अफ्रीकी देशों को जाता है, पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है।"
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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