बेटियों के वैवाहिक जीवन में माँ की भूमिका

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मांँ और बेटी का रिश्ता सुख-दुख का एक साँझा रिश्ता होता है। यह अटूट बंधन की तरह होता है पर बेटी की शादी के बाद इस रिश्ते को एक नए सिरे से संभालने की जरूरत होती है ताकि बेटी मायके और ससुराल दोनों ही जगह सबकी लाडली बन सके और इसके लिए एक मांँ की […]

मांँ और बेटी का रिश्ता सुख-दुख का एक साँझा रिश्ता होता है। यह अटूट बंधन की तरह होता है पर बेटी की शादी के बाद इस रिश्ते को एक नए सिरे से संभालने की जरूरत होती है ताकि बेटी मायके और ससुराल दोनों ही जगह सबकी लाडली बन सके और इसके लिए एक मांँ की भूमिका काफी मायने रखती है।

अपने माता-पिता की दुलारी, अपने भाई की लाडली जो घर आंगन में अठखेलियाँ करती हुई प्यारी बिटिया न जाने कब बड़ी हो जाती है, पता ही नहीं चलता । जब हाथ पीले करने की बेला आती है तो आंँखें आंसू से भर-भर जाती है। सच में कितना दर्द भरा होता है एक बेटी का बिछडऩा एक माँ के लिए जब उसके कलेजे का टुकड़ा हर सुख-दुख की साथी बिटिया एक दिन इस तरह पराई हो जाती है ।

फिर इस दौर से गुजर कर ससुराल में बहू बन जाती है। चंचलता और शरारतें गंभीरता का रूप ले लेती हैं । बेपरवाह कदमों का प्रवाह सधे हुए कदमों की गति में बदल जाता है।

इतने बदलाव के बाद भी यह सही है कि सात फेरे बेटी को ससुराल से इतना जोड़ते नहीं है जितना मायके से दूर कर देते हैं पर ऐसे नाजुक समय में मांँ की भूमिका अहम हो जाती है । एक विवाहित बेटी के जीवन में मांँ का मार्गदर्शन महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है । मांँ अपनी बेटी की भावनाओं को, आवश्यकताओं, दुख दर्द आदि को अच्छी तरह जानती समझती है। एक माँ अपने अनुभवों और सीख द्वारा बेटी के व्यक्तित्व और उसके विचारों को पुष्ट कर सकती है जिससे उसका भविष्य बन सके।

बेटी को एक मर्यादा के बंधन में बांँधने के लिए उस की डोर को मजबूत रखने के लिए मांँ की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है  क्योंकि भावनाओं की बाढ़ आने से सब कुछ बिखर सकता है। एक मांँ ही होती है जो बेटी को मान मर्यादा ऊंँच-नीच सही गलत की परख करना सिखाती है। मां-बेटी का रिश्ता ममता, प्रेम व अपनत्व का होता है लेकिन यह भी सच है कि उस पर जिम्मेदारियों का बोझ भी कुछ कम नहीं होता ।

ऐसे में हर मांँ का फर्ज बनता है कि वह बेटी को उसकी हर जिम्मेदारी सामाजिक रीति-रिवाजों से रूबरू कराएं। जब एक बेटी बहू बनकर ससुराल पहुंँचती है तब उस परिवार को ढेरों अपेक्षाएं होती है। पति, सास – ससुर, ननद – देवर, हर किसी को नई बहू से आशाएं और आकांक्षाएं होती हैं । ऐसे में मांँ को बचपन से ही अपनी बेटी में उदारता, प्रेम, दया, समझौता आदि की भावना जागृत करनी चाहिए ताकि ससुराल जाकर अपने सास-ससुर, नन्द – देवर के दुख दर्द को बांँट सके तथा उनकी आवश्यकताओं का ख्याल रख सके।

मां – बेटी दोनों एक दूसरे के सुख – दु:ख के साथी होते हैं और एक राजदार होती है लेकिन शादी होने के बाद यह सिलसिला टूट सा जाता है। दोनों के बीच कुछ दूरियांँ बन जाती हैं तो उसे मांँ – बेटी या दोनों ही नहीं समझ पाती हैं। मांँ की ख्वाहिश रहती है कि अभी भी उसकी बेटी पहले की तरह उसकी बात सुने और माने और उसे महत्व दे।

कई जगह बेटी शादी के बाद भी मांँ का पल्लू पकड़ कर चलना चाहती है । इसके ऐसा करना उसके पति व ससुराल वालों को नागवार गुजरता है । ऐसी स्थिति में मां की भूमिका थोड़ी कठिन हो जाती है । उसे बेटी की भावना का ख्याल रखना पड़ता है और उसके ससुराल की स्थिति को भी समझाना पड़ता है।

वह मांँ दूरदर्शी होती है जो शादी से पहले ही अपनी बेटी को मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार कर लेती है। उसे ससुराल के सभी सदस्यों और मान सम्मान का पूरी तरह ख्याल रखना है। बेटी को ससुराल में कैसे रहना होता है? अपने घर को कैसे बनाना है? हर बात में सलाह देती है, इसलिए मांँ अपनी बेटी को गृहस्थी बसाने में मदद करती है।

माँ अपनी बेटी के साथ में पारिवारिक जीवन के लिए अपने मोह को कम कर देती है ताकि उनकी बेटी उनके ससुराल वालों का उचित ध्यान रख पाए। बिना किसी कारण अपनी बेटी के घर बार-बार नहीं जाती और हमेशा संस्कारित होने की सीख देती है। कई बार रिश्तों में बहुत मामूली से बात पर भी दरार आ जाती है । इसलिए एक मांँ की कोशिश रहती है कि छोटी-छोटी बातों को महत्व ना दे क्योंकि इससे रिश्ते में कड़वाहट पैदा होती है।

मां का कर्तव्य रहता है कि वह बेटी की कमजोरियों को दूर करें और उसकी ताकत और क्षमता को सही मोड़ दे। उसके गुण को संँवारने के साथ-साथ व्यवहारिक ज्ञान भी देती है। सामाजिक कुरीतियों से उसे अवगत कराती है । उसे आत्मनिर्भर बनाती है और साथ ही आत्मविश्वास की भावना भी भरती है। उसे न्याय का साथ देने व अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने की शिक्षा देती है। यह बेहद जरूरी है। ऐसा नहीं है कि शादी हो जाने के बाद मायके का साथ छूट जाए ।

इसलिए तीज – त्यौहार – जन्मदिन आदि पर अपने बेटी – दामाद को घर आमंत्रित करती है। माँ अपनी बेटी को पूरा विश्वास और सहयोग देती है ताकि कभी उसे जरूरत पडऩे पर इधर-उधर भटकना न पड़े । निराश जीवन जीने पर मजबूर न होना पड़े। शादी के सामान के साथ कुछ रुपए भी बेटी के नाम जमा करवाती है।

माता-पिता के संस्कार ही बच्चों को विरासत में मिलते हैं । इसलिए एक मांँ अपनी बेटी के दांपत्य जीवन में प्रत्यक्ष रूप से खुशियाँ भरने की कोशिश करती है। बेटी को विदा करने से पहले उसके हृदय में पति के साथ-साथ उसके परिवार वालों के लिए प्यार और अपनापन भरती है । उसे अच्छे संस्कार विनम्रता और सश्वुणों की अनमोल सौगात देती है ताकि बेटी का विवाहित जीवन फूलों की तरह खिलता रहे और महकता रहे।

बेटी ससुराल में भी अपने मां – बाप का नाम रोशन करे। बेटियां दो कुलों की लाज होती है । बेटियों को दो कुलों के नाम रोशन करने होते हैं। इसलिए मां बेटियों को शुरू से ही संस्कारित शिक्षा का ज्ञान देकर संवारती है। घर की बेटियों से ही परिवार संवरता – संभलता है। इसमें मां की भूमिका अहम होती है।
– डा.नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी

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