एक पेड़ लगाएंगे तो सालों तक कमाई, जापानी फल की खेती में छिपा है मोटा मुनाफा, जानें किन किसानों के लिए सबसे बढ़िया मौका
पारंपरिक फसलों से होने वाली कमाई में लगातार उतार-चढ़ाव के बीच किसान अब ऐसी बागवानी फसलों की तलाश कर रहे हैं, जिनसे लंबे समय तक बेहतर आमदनी हो सके। जापानी फल यानी पर्सिमन ऐसी ही एक प्रीमियम फल फसल है, जिसकी मांग बड़े शहरों की मंडियों और सुपरमार्केट में तेजी से बढ़ रही है। सही जलवायु, मिट्टी और देखभाल मिलने पर इसकी खेती किसानों के लिए अच्छी कमाई का जरिया बन सकती है।
जापानी फल की खेती क्यों बन रही है खास
पर्सिमन को भारत में आमतौर पर जापानी फल या खुरमा के नाम से जाना जाता है। इसका आकर्षक नारंगी रंग और मीठा, रसीला स्वाद इसे दूसरे फलों से अलग पहचान देता है। इसकी खास मांग प्रीमियम बाजार में देखने को मिलती है, जहां अच्छी क्वालिटी के फल को बेहतर कीमत मिल सकती है।इस फल की खेती के लिए हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड जैसे ठंडे क्षेत्रों को अनुकूल माना जाता है। दक्षिण भारत के कुछ पहाड़ी इलाकों में भी इसकी पैदावार की संभावना रहती है। पर्सिमन के पेड़ों में कई दूसरी बागवानी फसलों की तुलना में बीमारियों का दबाव कम हो सकता है, जिससे उचित प्रबंधन के साथ रखरखाव का खर्च नियंत्रित रखा जा सकता है।
ऐसी मिट्टी और मौसम में बेहतर होता है उत्पादन
पर्सिमन की खेती के लिए ऐसी जगह बेहतर मानी जाती है जहां सर्दी अच्छी हो और गर्मियों में पर्याप्त धूप मिले। खेत में पानी जमा नहीं होना चाहिए। रेतीली दोमट मिट्टी इसके लिए उपयुक्त मानी जाती है और मिट्टी का पीएच लगभग 6.5 से 7.5 के बीच रखना बेहतर रहता है।
खेत तैयार करते समय गहरी जुताई करके मिट्टी को अच्छी तरह भुरभुरा किया जा सकता है। इसके साथ जैविक खाद का इस्तेमाल भी किया जाता है। पहाड़ी या ढलान वाले खेतों में मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए कंटूर पद्धति से क्यारियां और गड्ढे तैयार करना उपयोगी रहता है।
पौधे लगाने में गलती पड़ सकती है भारी
अच्छे उत्पादन के लिए स्वस्थ और उन्नत ग्राफ्टेड या बडिंग से तैयार पौधों का चुनाव महत्वपूर्ण है। रोपाई के लिए शुरुआती बसंत का समय उपयुक्त माना जाता है। पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखना भी जरूरी है, ताकि बड़े होने पर पेड़ों को फैलने के लिए जगह और पर्याप्त धूप मिल सके। सामान्य तौर पर 4x4 मीटर से 6x6 मीटर तक की दूरी पर पौधे लगाए जा सकते हैं।
ग्राफ्टेड पौधों से व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने में कई साल लग सकते हैं। उचित देखभाल मिलने पर करीब चार से पांच साल में पहली व्यावसायिक उपज मिलने की संभावना रहती है। शुरुआती वर्षों में पेड़ के आसपास खरपतवार को नियंत्रित करना और मिट्टी में नमी बनाए रखना बेहद जरूरी होता है। जड़ों के आसपास सूखी पत्तियों से मल्चिंग करने से भी नमी बचाने में मदद मिल सकती है।
खाद और पानी का रखें खास ध्यान
पर्सिमन के पेड़ों की अच्छी वृद्धि और फल बनने के लिए संतुलित पोषण जरूरी है। खाद की मात्रा पेड़ की उम्र और मिट्टी की स्थिति के अनुसार तय करना बेहतर रहता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार संतुलित खाद में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का उचित अनुपात रखा जाता है और इसकी खुराक को अलग-अलग समय पर दिया जा सकता है।
इस फसल में जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन देना नुकसानदायक हो सकता है, क्योंकि इससे फल गिरने की समस्या बढ़ सकती है। फल बनने के समय मिट्टी में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए। हालांकि खेत में लगातार पानी जमा रहने से जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए सिंचाई और जल निकासी दोनों का संतुलन जरूरी है।
शहरों की मंडियों में मिल सकती है अच्छी कीमत
पर्सिमन को प्रीमियम फल के तौर पर बाजार में जगह मिल रही है। इसमें डाइटरी फाइबर, विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जिसके कारण स्वास्थ्य के प्रति जागरूक ग्राहकों के बीच इसकी मांग रहती है। बड़े शहरों की मंडियों और सुपरमार्केट में इसकी कीमत सामान्य फलों की तुलना में बेहतर मिल सकती है।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक अच्छी गुणवत्ता वाला पर्सिमन कुछ बाजारों में करीब 100 से 200 रुपये प्रति किलो तक बिक सकता है। हालांकि वास्तविक कीमत किस्म, गुणवत्ता, मौसम, उत्पादन, स्थानीय मांग और बाजार पर निर्भर करती है। इसलिए खेती शुरू करने से पहले किसान के लिए अपने क्षेत्र की जलवायु के साथ-साथ संभावित बाजार और बिक्री व्यवस्था की जानकारी जुटाना जरूरी है।
लंबे समय के लिए कमाई का विकल्प
पर्सिमन की खेती उन किसानों के लिए दिलचस्प विकल्प हो सकती है जो पारंपरिक फसलों के साथ बागवानी में नया रास्ता तलाश रहे हैं। इसमें तुरंत कमाई की उम्मीद करने के बजाय शुरुआती वर्षों में पौधों की देखभाल और बाग तैयार करने पर ध्यान देना पड़ता है। पेड़ों के व्यावसायिक उत्पादन में आने के बाद नियमित उपज से लंबे समय तक आमदनी का रास्ता बन सकता है।
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