शिक्षक दिवस पर मंथन: मां पहली गुरु, शिक्षक दूसरा; बच्चों के बौद्धिक विकास के साथ संस्कार देना भी जरूरी
आज शिक्षक दिवस है। शिक्षक अर्थात् 'गुरु', क्योंकि पुरातन काल से आचार्य को 'गुरु' की संज्ञा से विभूषित किया जाता रहा है। देखना यह है कि बच्चे का प्रथम गुरु कौन है। हमारी संस्कृति में प्रथम गुरु का स्थान माता को प्राप्त है, क्योंकि शिशु अवस्था में शिक्षण संस्थाओं जाने तक माता ही गुरु होती है। मनुस्मृति का श्लोक 105 के अनुसार "उपाध्याया दशाचार्य:, आचार्याणां शतम् पिता। सहस्रं तु पितृन् माता गौरवेणातिरिच्यते।" अर्थात् उपाध्याय से आचार्य का गौरव दश गुना, आचार्य के गौरव से माता-पिता का गौरव सौ गुना और उससे हजार गुना स्थान मिला है। तात्पर्य यह है कि माता अपने बच्चे को भौतिक अथवा बौद्धिक रूप में तो ढाल सकती है, क्योंकि यह उसे जन्म देने से पूर्व ही उसका निर्माण आरम्भ कर देती है। माता के पश्चात् दूसरा गुरु शिक्षक होता है। शिक्षक का दायित्व होता है कि वह अपने विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के साथ-साथ नैतिक तथा सद्गुणों का विकास करे। शिक्षक सुधारने वाला होता है और विद्यार्थी सुधरने वाला। अनुपात के हिसाब से हम तुलना धरातल में ऊँच नीच की करेंगे। क्या निर्दोष शिशुओं को बच्चा जब शिक्षण संस्थान में प्रवेश करता है, अति से उत्तरी धरातल की ओर प्रकृति बदलती दिखेगी। शिक्षण संस्थान जाने के पश्चात यह सम्भावना नहीं रहेगी कि बच्चा परीक्षा में शिक्षक से नंबर माँग ले। यह तो कहना पड़ा रहा है कि आज शिक्षक की साख पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है। विचार करें तो ऐसा नहीं होना चाहिए। यह ही एक ऐसा मुख्य 'साधन' है जो कि अंधकार को दूर करता है। शिक्षक दिवस को इसके उपयुक्त धरातल स्तर पर गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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