दहेज हत्या के मुख्य आरोपी पति को जमानत देना जज को पड़ा भारी: हाईकोर्ट ने दिए विभागीय जांच के आदेश
प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दहेज हत्या के मामले में पर्याप्त साक्ष्यों और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के तहत लागू वैधानिक अनुमान की अनदेखी कर पति को जमानत देने वाले एडिशनल सेशन जज के खिलाफ जांच की सिफारिश की है। उच्च न्यायालय ने पति को दी गई जमानत भी रद्द कर दिया है। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की कोर्ट ने जालौन के उरई स्थित एडिशनल सेशन जज, कोर्ट नंबर-1 द्वारा आरोपी पति को दी गई जमानत के खिलाफ दाखिल जमानत रद्द करने की अर्जी पर यह आदेश दिया।
उच्च न्यायालय ने पहले एडिशनल सेशन जज से यह बताने को कहा था कि उन्होंने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के तहत लागू अनुमान की अनदेखी करते हुए बिना पर्याप्त कारण बताए पति को जमानत कैसे दे दी। अपने स्पष्टीकरण में एडिशनल सेशन जज सतीश चंद्र द्विवेदी ने स्वीकार किया कि आरोपी के खिलाफ दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ना के साक्ष्य मौजूद थे और मृतका की शादी को सात वर्ष पूरे नहीं हुए। उन्होंने यह भी माना कि धारा 118 के तहत वैधानिक अनुमान लागू होता था। हालांकि, उन्होंने कहा कि पति को उसकी सास और ससुर को मिली जमानत के आधार पर समानता के सिद्धांत पर जमानत दी गई।
उच्च न्यायालय ने इस स्पष्टीकरण को जमानत देने के लिए पर्याप्त नहीं माना। हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित जज ने जमानत देने के अपने विवेक का “मनमाने ढंग से प्रयोग” किया। अदालत ने कहा कि पर्याप्त सामग्री मौजूद होने, धारा 118 के तहत अनुमान लागू होने और जमानत देने का कोई कारण दर्ज नहीं किए जाने के बावजूद आरोपी पति को राहत दी गई। हाईकोर्ट ने कहा कि जमानत देने के तरीके से न्यायिक विवेक के इस्तेमाल को लेकर संदेह पैदा होता है।
हालांकि,उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह संबंधित जज की ईमानदारी या निष्ठा पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा है। अदालत ने कहा कि मामले की प्रशासनिक स्तर पर जांच की आवश्यकता है। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि मामले को प्रशासनिक समिति के समक्ष रखा जाए, ताकि यह विचार किया जा सके कि पर्याप्त सामग्री और धारा 118 के तहत लागू अनुमान के बावजूद आरोपी पति को जमानत देने के लिए “गलत और मनमाने तरीके से अधिकार का प्रयोग” करने को लेकर संबंधित एडिशनल सेशन जज के खिलाफ जांच आवश्यक है या नहीं।
उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के जमानत आदेश को “पूरी तरह गलत” करार देते हुए आरोपी सतेंद्र उर्फ सोनू की जमानत रद्द कर दी और उसे 10 दिन के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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