सुख-दुख और कर्म: जीवन का अनंत चक्र
सुख और दुख जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, यह संदेश धार्मिक और दार्शनिक विचारों में सदियों से साझा किया जाता रहा है। वेदों के अनुसार इंसान अपने पिछले जन्मों के कर्मों का प्रतिफल भुगतता है। अच्छे कर्मों से सुख की प्राप्ति होती है और बुरे कर्मों से दुख। इसी आधार पर जीवन में सुख और दुख दोनों अनुभव किए जाते हैं।
लेकिन यह सुख और दुख स्थायी नहीं हैं। जब तक जन्म और मरण का चक्र चलता रहेगा, तब तक मनुष्य इन अनुभवों से गुज़रता रहेगा। केवल मोक्ष प्राप्ति के माध्यम से ही दुखों से मुक्ति और परम आनंद का अनुभव संभव है।
जिन लोगों ने अपने कर्मों को सही दिशा में किया और पुनर्जन्म के चक्र से बाहर निकलने की ओर ध्यान केंद्रित किया, उनके लिए जीवन का अंतिम लक्ष्य आत्मा की शांति और मोक्ष की प्राप्ति है। शास्त्र यह भी बताते हैं कि शरीर धारण करने वाले के लिए पूर्ण सुख की प्राप्ति असंभव है, इसलिए जीवन में आने वाले सुख और दुख को समझदारी से भोगना और अपने कर्मों को सुधारना ही सर्वोत्तम मार्ग है।
इस प्रकार जीवन में सुख-दुख का अनुभव केवल कर्मों का परिणाम है और मोक्ष ही अंतिम लक्ष्य है, जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाता है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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