ईर्ष्या: मन की शांति को खोने वाली भावना और उससे बचने के उपाय
ईर्ष्या एक अत्यंत जटिल और हानिकारक भावना है। यह मन की खाली जमीन पर उगती एक “नागफनी” की तरह है, जिसके कांटे सबसे अधिक उस व्यक्ति को चुभते हैं, जो इसे पालता है। ईर्ष्या के कारण व्यक्ति दूसरों की उन्नति से प्रसन्न नहीं हो पाता और खुद के भीतर अशांति पैदा करता है।
सज्जन व्यक्ति दूसरों की सफलता देखकर आनंदित होता है, जबकि ईर्ष्यालु व्यक्ति को यह बर्दाश्त नहीं होता। ईर्ष्या न केवल दूसरों के प्रति नकारात्मक भाव उत्पन्न करती है, बल्कि अपने पालने वाले को ही जलाती है। यह चुपके से मानसिक शांति और संतोष को क्षतिग्रस्त कर देती है।
ईश्वर ने मनुष्य को ज्ञान और विवेक से संपन्न किया है, लेकिन अज्ञान की वजह से लोग दूसरों से ईर्ष्या करते हैं। वह परमात्मा की व्यवस्था में भी दोष ढूँढ़ने लगते हैं—“क्यों किसी ने इतना पाया और मुझे नहीं?”—और इस सोच से पाप में भागी बनते हैं।
अंततः ईर्ष्या अनेक दोषों की जननी है। इसे अपने मन से दूर रखना ही मानसिक शांति और आंतरिक संतोष का मार्ग है, अन्यथा यह आपके मन को अशांति के अंधे कुएँ में धकेल देती है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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