ईर्ष्या: मनुष्य का सबसे खतरनाक रोग, जो स्वयं को ही करता है नष्ट
मानवीय स्वभाव में ईर्ष्या एक ऐसा आत्मघाती रोग है जो जिस हृदय में पनपता है उसे ही धीरे-धीरे समाप्त कर देता है। इस विकार की सबसे अद्भुत और विडंबनापूर्ण बात यह है कि जिससे ईर्ष्या की जाती है उसका रत्ती भर भी अहित नहीं होता। समाज में अक्सर देखा जाता है कि दुर्जन व्यक्ति सज्जनों की प्रतिष्ठा और उन्हें मिलने वाले सम्मान से जलते हैं। वे इस सोच में घुले जाते हैं कि आखिर समाज में उन्हें इतना आदर क्यों मिल रहा है। सत्य तो यह है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति के जलने से सज्जनों के सम्मान या उनकी उपलब्धियों में कोई कमी नहीं आती बल्कि ईर्ष्या करने वाला व्यक्ति अपना मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य स्वयं ही बिगाड़ लेता है।
पशुवत व्यवहार और विवेक की कमी
ईर्ष्या के वशीभूत होकर मनुष्य कभी-कभी पशुओं से भी निम्न स्तर पर उतर आता है। यद्यपि ईर्ष्या का भाव पशुओं में भी देखा जाता है जब वे अपने स्वामी का प्रेम दूसरे पशु के प्रति देखकर गुर्राने लगते हैं किंतु पशुओं का ऐसा व्यवहार ज्ञान और विवेक के अभाव के कारण होता है। इसके विपरीत ईश्वर ने मनुष्य को पर्याप्त ज्ञान और विवेक की शक्ति प्रदान की है। इसके बावजूद यदि मनुष्य मूर्खतावश इस मानसिक रोग को गले लगाता है तो यह उसकी बौद्धिक दरिद्रता को दर्शाता है।
छिद्रान्वेषण: गुणों में दोष ढूंढने की बीमारी
ईर्ष्या का यह रोग एक और भयंकर बुराई को जन्म देता है जिसे 'छिद्रान्वेषण' कहा जाता है। इस विकार के कारण मनुष्य को दूसरों के उज्ज्वल गुणों में भी केवल दोष ही दिखाई देने लगते हैं। छिद्रान्वेषण आगे चलकर 'पर-निंदा' यानी दूसरों की बुराई करने के पाप की ओर ले जाता है। धीरे-धीरे दूसरों की कमियां ढूंढना ईर्ष्यालु व्यक्ति के स्वभाव का हिस्सा बन जाता है और वह अपना बहुमूल्य समय और ऊर्जा दूसरों को नीचा दिखाने के व्यर्थ प्रयासों में नष्ट करने लगता है।
शांति का मार्ग और आत्म-चिंतन
विचारणीय प्रश्न यह है कि जब आप ईर्ष्या करके दूसरों का कुछ बिगाड़ ही नहीं सकते तो फिर ऐसा पाप करके अपनी आंतरिक शांति को क्यों भंग कर रहे हैं। ईर्ष्या वास्तव में अपनी ही रेखा को छोटी करने का प्रयास है जबकि उन्नति का मार्ग अपनी रेखा को बड़ा करने में निहित है। आध्यात्मिक शांति के लिए यह आवश्यक है कि हम दूसरों की प्रगति में प्रसन्न होना सीखें और अपने विवेक का उपयोग कर इस मानसिक विष से स्वयं को मुक्त रखें।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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