होली का महापर्व: रंगों की खुशियों के साथ सुरक्षा और मर्यादा का रखें विशेष ध्यान
होली का पावन पर्व आज पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। चारों ओर "बुरा न मानो होली है" की गूंज सुनाई दे रही है, जो आपसी मतभेद भुलाकर एक-दूसरे के गले मिलने का संदेश देती है। रंगों के इस उत्सव का आनंद तभी सार्थक है जब हम इसे सुरक्षित तरीके से मनाएं।
वर्तमान में खुशी के प्रदर्शन के नाम पर रासायनिक और चटकीले रंगों का चलन बढ़ गया है, जो चिंता का बड़ा कारण है। ये कृत्रिम रंग न केवल त्वचा को हानि पहुँचाते हैं, बल्कि बच्चों और महिलाओं की कोमल त्वचा के लिए अत्यंत खतरनाक साबित हो सकते हैं। बेहतर यही है कि हम प्राचीन परंपराओं की ओर लौटें और फूलों से तैयार प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करें। यदि बाजार से गुलाल खरीदना हो, तो केवल प्रमाणित हर्बल गुलाल का ही चयन करें।
ये भी पढ़ें मुजफ्फरनगर: दिल्ली-देहरादून कॉरिडोर पर पलटा गन्ने से लदा ट्रैक्टर, नीचे दबने से किसान की दर्दनाक मौतयदि प्राकृतिक रंग सुलभ न हों, तो शुद्ध पानी से होली खेलना एक बेहतर और सुरक्षित विकल्प है। हमें याद रखना चाहिए कि होली का असली आनंद रंगों की चमक में नहीं, बल्कि भाईचारे और प्रेम के भाव में है। इसके अतिरिक्त, त्योहार के उत्साह में हमें अपनी मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। विशेष रूप से महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार बनाए रखें। आपकी एक छोटी सी अशिष्टता किसी के लिए जीवनभर की पीड़ा का कारण बन सकती है। सुरक्षित खेलें, मर्यादित रहें और इस पर्व को खुशहाल बनाएं।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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