सुख-दुख: इच्छाओं की पूर्ति और सच्ची शांति का महत्व
जीवन की भागदौड़ और भौतिक वस्तुओं के संचय के बीच आज मनुष्य सुख की परिभाषा को भूलता जा रहा है। दार्शनिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो संसार के किसी भी पदार्थ में न तो सुख समाहित है और न ही दुख। वास्तव में किसी वस्तु की इच्छा उत्पन्न होने के बाद और उसकी प्राप्ति से पहले जो मन में व्याकुलता पैदा होती है, उसी का नाम दुख है। जब वह इच्छित वस्तु मिल जाती है और मन की वह बेचैनी शांत होती है, तो उस क्षणिक शांति को ही मनुष्य सुख समझ बैठता है।
इस गूढ़ सत्य को व्यावहारिक उदाहरणों से समझा जा सकता है। एक प्यासे व्यक्ति के लिए पानी सुख का स्रोत है, लेकिन जैसे ही उसकी प्यास बुझ जाती है, वही पानी उसके लिए अर्थहीन हो जाता है। यदि प्यास बुझने के बाद भी उसे बलपूर्वक पानी पिलाया जाए, तो वही सुखद अनुभव दुख में बदल जाता है। इसी प्रकार कड़ाके की ठंड में ऊनी वस्त्र सुख प्रदान करते हैं, लेकिन ज्येष्ठ मास की तपती दोपहरी में वही वस्त्र शरीर के लिए कष्टकारी बन जाते हैं। यदि सुख वस्तु के भीतर होता, तो वह हर परिस्थिति और हर समय में सुख ही प्रदान करती, परंतु ऐसा नहीं होता।
भूख और भोजन का संबंध भी इसी सिद्धांत पर टिका है। भूखे व्यक्ति को भोजन में अतीव आनंद मिलता है, लेकिन पेट भरने के बाद अतिरिक्त भोजन केवल पीड़ा का कारण बनता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सुख पदार्थ में नहीं बल्कि हमारी कामनाओं की पूर्ति की स्थिति में निहित है। किसी वस्तु की अनुपलब्धता ही दुख की जड़ है और उसकी प्राप्ति मात्र उस दुख का अल्पकालिक अंत है।
वास्तविक आनंद और स्थिरता केवल आत्मबोध से ही संभव है। जब मनुष्य अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण पा लेता है और इच्छाओं की निवृत्ति हो जाती है, तब उसे उस शांति का अनुभव होता है जो स्थायी है। शांति ही जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य होना चाहिए क्योंकि भौतिक वस्तुओं पर आधारित सुख सदैव पराधीन होता है। जिसका सुख किसी दूसरे प्राणी या बाहरी वस्तु पर निर्भर है, वह व्यक्ति कभी स्वतंत्र नहीं हो सकता। पराधीनता में सुख का वास संभव नहीं है, इसलिए सच्चा सुख भीतर की संतुष्टि और इच्छाओं के त्याग में ही छिपा है।
रॉयल बुलेटिन से जुड़ें:
देश-प्रदेश की ताज़ा ख़बरों को सबसे पहले पढ़ने के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल को फॉलो करें:
आपको यह खबर कैसी लगी? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर दे। आपकी राय रॉयल बुलेटिन को और बेहतर बनाने में बहुत उपयोगी होगी।
संबंधित खबरें
लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

टिप्पणियां