होलिका दहन 2026: प्राचीन परंपरा और नए अन्न की पूजा का महत्व
आज देशभर में होलिका दहन का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। लोक परंपराओं में इसे बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, परंतु इस पर्व का प्राचीन और शास्त्रीय स्वरूप अत्यंत वैज्ञानिक और कृषि प्रधान रहा है। शास्त्रों में इस पर्व का प्राचीनतम नाम बासन्ती नव सस्येष्टि मिलता है, जिसका सरल अर्थ है वसंत ऋतु के नए अनाजों के माध्यम से किया जाने वाला यज्ञ। जानकारों का मत है कि आधुनिक समय में यह पर्व मात्र लकड़ी और इंधन जलाने की एक परंपरा बनकर रह गया है, जबकि इसके पीछे छिपे गहरे उद्देश्य को समाज ने कहीं न कहीं नजरअंदाज कर दिया है।
शब्दों की व्युत्पत्ति पर दृष्टि डालें तो होली शब्द वास्तव में होलक का अपभ्रंश है। भाव प्रकाश के एक श्लोक के अनुसार तिनके की अग्नि में भुने हुए अथवा अधपके फली वाले अन्न को होलक कहा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार यह होलक वात, पित्त और कफ जैसे शारीरिक दोषों का दमन करने की क्षमता रखता है। प्रतीकात्मक रूप से देखें तो किसी भी अनाज की ऊपरी परत को होलिका कहा जाता है तथा इसके भीतर सुरक्षित रहने वाली चने, मटर, गेहूं और जौं की गिरी को प्रहलाद का नाम दिया गया है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में होलिका को माता कहकर संबोधित किया गया क्योंकि वह अनाज के भीतर की गिरी का निर्माण और सुरक्षा करती है।
होलिका दहन के समय जयकारे लगाने की परंपरा के पीछे भी एक वैज्ञानिक तर्क है। जब अन्न को अग्नि में भूना जाता है तो ऊपरी परत यानी होलिका स्वयं जलकर भीतर के प्रहलाद यानी अनाज के दाने को सुरक्षित बचा लेती है। अपने अस्तित्व को जलाकर जीवन प्रदान करने के इसी गुण के कारण उसे माता मानकर सम्मान दिया जाता है। प्राचीन काल में यह आयोजन एक सामूहिक यज्ञ के रूप में होता था जिसमें नए अनाज की आहुति दी जाती थी। मान्यता रही है कि यज्ञ की सुगंध और धूम्र से अनाज स्वस्थ होता था और पैदावार में वृद्धि होती थी।
वर्तमान समय में इस पर्व के स्वरूप में आए बदलाव पर विद्वानों ने चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि आज हम केवल इंधन जलाकर परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं, जबकि मूल उद्देश्य नई फसल के आगमन की खुशी में सामूहिक आरोग्य और यज्ञ की परंपरा को जीवित रखना था। यदि समाज पुनः इस पर्व के वैज्ञानिक और औषधीय महत्व को समझने लगे तो पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए यह उत्सव अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है।
रॉयल बुलेटिन से जुड़ें:
देश-प्रदेश की ताज़ा ख़बरों को सबसे पहले पढ़ने के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल को फॉलो करें:
आपको यह खबर कैसी लगी? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर दे। आपकी राय रॉयल बुलेटिन को और बेहतर बनाने में बहुत उपयोगी होगी।
संबंधित खबरें
लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

टिप्पणियां